भगवान विश्वकर्मा – ब्रह्मांड के दिव्य शिल्पकार
भूमिका
सनातन धर्म के विशाल देवमंडल में प्रत्येक देवता जीवन के किसी न किसी शाश्वत सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनमें से भगवान विश्वकर्मा रचनात्मकता, अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) और शिल्पकला के प्रतीक माने जाते हैं। देवशिल्पी कहलाने वाले विश्वकर्मा प्रथम अभियंता, मूर्तिकार और दिव्य शिल्पकार के रूप में पूजनीय हैं। विश्वकर्मा पूजा, जो प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति को मनाई जाती है, केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि मानव श्रम, कौशल और उन उपकरणों का उत्सव है, जिनसे सभ्यता कायम है।
भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?
ऋग्वेद, महाभारत और पुराणों में भगवान विश्वकर्मा का वर्णन देवताओं के दिव्य शिल्पकार के रूप में किया गया है। उनका नाम ही बताता है – “विश्व” (संसार/ब्रह्मांड) और “कर्म” (सृजन/क्रिया) – अर्थात् ब्रह्मांड का सृजनकर्ता।
शास्त्रीय उल्लेख
- ऋग्वेद में उन्हें शिल्प और निर्माण के देवता कहा गया है, जिन्होंने आकाश और पृथ्वी की रचना की।
- महाभारत में उनका वर्णन देवताओं के दिव्य रथ और शस्त्रों के निर्माता के रूप में है।
- रामायण में उन्होंने लंका का निर्माण किया, पहले कुबेर के लिए और बाद में भगवान शिव-पार्वती के लिए।
- उन्होंने भगवान कृष्ण की द्वारका और पांडवों की इन्द्रप्रस्थ नगरी का भी निर्माण किया।
भगवान विश्वकर्मा की दिव्य कृतियाँ
- पुष्पक विमान – कुबेर का दिव्य रथ, जिसे बाद में रावण ने प्रयोग किया।
- सुदर्शन चक्र – भगवान विष्णु का दिव्य अस्त्र।
- त्रिशूल – भगवान शिव का शक्तिशाली शस्त्र।
- वज्र – इन्द्र का अस्त्र, जिसे ऋषि दधीचि की अस्थियों से निर्मित किया गया।
इस प्रकार भगवान विश्वकर्मा केवल वास्तुकला के देवता ही नहीं, बल्कि तकनीक, डिज़ाइन और आविष्कार के शाश्वत प्रतीक हैं।
विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाई जाती है?
विश्वकर्मा पूजा केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि श्रम, नवाचार और कृतज्ञता का सांस्कृतिक उत्सव है।
- सृष्टिकर्ता के प्रति सम्मान – जैसे सरस्वती ज्ञान की और लक्ष्मी धन की देवी हैं, वैसे ही विश्वकर्मा कौशल और नवाचार के देवता हैं।
- औज़ार और कार्यस्थल की पवित्रता – इस दिन औज़ारों, मशीनों और वाहनों की सफ़ाई कर उन्हें पूजनीय माना जाता है।
- श्रम और नेतृत्व का सामंजस्य – कारखानों व कार्यालयों में मालिक और श्रमिक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं।
- कृतज्ञता और नवीनीकरण – यह दिन आजीविका के साधनों के प्रति आभार और नयी ऊर्जा के साथ कार्यारंभ का प्रतीक है।
विश्वकर्मा पूजा की विधियाँ
- वेदिका सजाना – कार्यस्थलों, कारखानों और घरों में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं।
- औज़ार और मशीनों की पूजा – औज़ारों, कंप्यूटरों, वाहनों आदि को फूल, सिंदूर और धूप से सजाकर पूजते हैं।
- भोग और प्रसाद – फल, मिठाइयाँ, पान और पारंपरिक प्रसाद का वितरण होता है।
- सामूहिक भोजन – औद्योगिक क्षेत्रों में विशेष भंडारे या लंगर आयोजित होते हैं।
- पतंगबाज़ी – बिहार, झारखंड, बंगाल और ओडिशा में पतंग उड़ाकर उत्सव मनाया जाता है।
क्षेत्रवार महत्व
- पूर्वी भारत (बिहार, बंगाल, ओडिशा, झारखंड): औज़ारों की पूजा और पतंग उत्सव।
- उत्तरी भारत (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश): कारखानों और कार्यस्थलों पर भव्य अनुष्ठान।
- दक्षिण भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश): अभियंता और वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं।
- पश्चिम भारत (गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान): उद्योग और शिल्पकार इसे नए कार्यारंभ का शुभ दिन मानते हैं।
आधुनिक संदर्भ में महत्व
- अभियंता (Engineers): डिज़ाइन, निर्माण और परिशुद्धता की पवित्रता का स्मरण।
- आईटी पेशेवर: कंप्यूटर और तकनीकी उपकरण भी आज के औज़ार हैं, जिन्हें पूजते हैं।
- उद्यमी व व्यापारी: केवल लाभ ही नहीं, बल्कि श्रमिकों के श्रम और कौशल का सम्मान।
- श्रमिक व कारीगर: उनके योगदान की पहचान और कार्यस्थल की सुरक्षा की प्रार्थना।
दार्शनिक महत्व
विश्वकर्मा पूजा हमें स्मरण कराती है कि सृजन स्वयं ईश्वरीय है। कर्मयोग के सिद्धांत के अनुसार श्रम ही पूजा है। बिना फल की अपेक्षा कार्य करते हुए हम सृष्टि की सतत प्रक्रिया में सहभागी बनते हैं।
निष्कर्ष
भगवान विश्वकर्मा केवल पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माता, नवाचार और परिश्रम के प्रतीक हैं। विश्वकर्मा पूजा हमें सिखाती है कि अपने कार्य को पूजा समझें, औज़ारों को देवता मानें और अपने कौशल को ईश्वर का वरदान समझकर समाज के हित में प्रयोग करें।
आज के यांत्रिक और तकनीकी युग में भी यह उत्सव हमें श्रम, समर्पण और कृतज्ञता के मानवीय मूल्यों को याद दिलाता है। जैसे भगवान विश्वकर्मा ने अद्भुत सृष्टियाँ रचीं, वैसे ही हम सब भी कौशल, सद्भाव और प्रगति पर आधारित भविष्य का निर्माण करें।

एक टिप्पणी
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