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चंद्रमा की 27 पत्नियाँ: दक्ष का शाप, रोहिणी और 27 नक्षत्रों का रहस्य

चंद्र ने दक्ष की 27 पुत्रियों से विवाह क्यों किया और उन्हें शाप क्यों मिला? रोहिणी, सोमनाथ और चंद्र-कलाओं की कथा, सभी 27 नक्षत्रों के देवता और स्वामी ग्रह सहित।

अंशुल पात्रो
Ancient Indian mythology meets astronomy in a cosmic artwork featuring Chandra and the 27 Nakshatras.

एक चंद्र-देव, और उनकी 27 पत्नियाँ

प्राचीन ऋषियों ने चंद्रमा के बारे में एक अनोखी कहानी कही थी।

उनका नाम था चंद्र, जिन्हें सोम भी कहते हैं, और उनकी थीं सत्ताईस पत्नियाँ। उन्होंने सब से समान प्रेम करने का वचन दिया था, पर वचन निभा न सके। मन एक पर अटक गया, वे उसी के पास ठहरे रहे, और इसी कारण शापित हुए।

सुनने में यह केवल पुराण-कथा लगती है। पर आकाश में तारों की पृष्ठभूमि पर चंद्रमा लगभग 27.3 दिन में अपना एक पूरा चक्कर लगाता है, और इस यात्रा में वह 27 तारा-समूहों से होकर गुज़रता है, जिन्हें भारतीय खगोलविदों ने हज़ारों वर्ष पहले पहचाना, नाम दिया और परखा।

इस लेख में पहले पूरी कथा है, जैसी पुराणों और सोमनाथ की परंपरा में सुरक्षित है। फिर हम आकाश की ओर चलेंगे: 27 नक्षत्र क्या हैं, हर नक्षत्र के देवता और स्वामी ग्रह कौन हैं, चंद्रमा उनसे कैसे गुज़रता है, और आज भी वे हमारे नाम, पंचांग और पर्व कैसे तय करते हैं।

चंद्र कौन हैं?

सनातन धर्म में चंद्र एक साथ दो रूपों में हैं: आकाश में दिखने वाला चंद्रमा भी, और अपने स्वभाव व कथाओं वाले देवता भी। उनके अनेक नाम हैं: सोम, शशि (जिनमें शशक यानी खरगोश का चिह्न है), इंदु, निशाकर (रात्रि को रचने वाले), और ओषधिपति, यानी औषधियों और वनस्पतियों के स्वामी।

उनकी उत्पत्ति के वर्णन अलग-अलग हैं। कई पुराण उन्हें महर्षि अत्रि और माता अनसूया का पुत्र बताते हैं, तो कुछ परंपराओं में वे समुद्र मंथन से प्रकट होते हैं। वैदिक यज्ञों में सोम एक पवित्र वनस्पति और उसका रस भी है, जिसे आगे की परंपरा ने चंद्रमा से जोड़ दिया।

चंद्र का स्वभाव शीतल और पोषण देने वाला है। भगवद्गीता (15.13) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे रसमय सोम बनकर सभी औषधियों का पोषण करते हैं। और अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए (10.21) वे कहते हैं: नक्षत्राणामहं शशी, यानी "नक्षत्रों में मैं चंद्रमा हूँ।" इस एक पंक्ति में भी चंद्र और नक्षत्र साथ-साथ हैं।

चंद्र, दक्ष और रोहिणी की पूरी कथा

दक्ष की सत्ताईस पुत्रियाँ

सृष्टि के प्रजापतियों में से एक, दक्ष प्रजापति की अनेक पुत्रियाँ थीं। भागवत पुराण के अनुसार वे साठ थीं, जिनका विवाह दक्ष ने अलग-अलग ऋषियों और देवताओं से किया: कुछ धर्म से, तेरह महर्षि कश्यप से (जिनमें देवताओं की माता अदिति और दैत्यों की माता दिति भी थीं), और सत्ताईस चंद्र से। दक्ष की ही एक और पुत्री सती भगवान शिव की अर्धांगिनी बनीं, जो इस कथा को और भी मार्मिक बना देता है।

चंद्र को सौंपी गई ये सत्ताईस बहनें स्वयं नक्षत्र थीं। दक्ष ने अपने जामाता से बस एक बात माँगी थी: सभी पत्नियों को बराबर सम्मान और स्नेह देना।

प्रियतमा रोहिणी

चंद्र यह वचन निभा न सके। सब बहनों में उनका मन रोहिणी पर रम गया, जो सबसे सुंदर और तेजस्वी बताई जाती हैं। वे लगभग सारा समय उन्हीं के साथ बिताने लगे, और बाकी छब्बीस बहनें रात-रात भर प्रतीक्षा करती रह गईं।

ध्यान देने की बात है कि कथा रोहिणी को दोष नहीं देती। दोष चंद्र का है, जिन्होंने अपना वचन तोड़ा।

शिकायत और चेतावनी

आहत बहनें अपने पिता के पास लौटीं। दक्ष ने चंद्र को समझाया कि सभी पत्नियों के साथ न्याय करें। चंद्र ने हाँ तो कहा, पर बदला कुछ नहीं। दक्ष ने फिर चेताया, फिर भी चंद्रमा रोहिणी के पास ही ठहरे रहे।

शाप

आख़िरकार दक्ष का धैर्य टूट गया। उन्होंने चंद्र को क्षय रोग का शाप दिया, जिसे ग्रंथों में क्षय या राजयक्ष्मा कहा गया है। चंद्र की कांति घटने लगी। हर रात वे पहले से दुबले और मलिन होते गए।

पुराण इसे केवल चंद्र का नहीं, पूरे जगत का संकट बताते हैं: चंद्र जिन वनस्पतियों का पोषण करते थे, वे मुरझाने लगीं। एक व्यक्ति की भूल पूरे संसार की पीड़ा बन गई।

प्रभास में तपस्या

व्याकुल चंद्र देवताओं के पास गए, और देवता उन्हें ब्रह्मा जी के पास ले गए। ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल भगवान शिव ही इस शाप से उबार सकते हैं, और उन्हें आज के गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित पवित्र प्रभास क्षेत्र भेजा। वहाँ चंद्र ने शिवलिंग स्थापित किया और लंबी, कठोर तपस्या से महादेव की उपासना की। शिव पुराण इस उपासना को महामृत्युंजय मंत्र से जोड़ता है, जो मृत्यु और क्षय पर विजय की प्रार्थना है।

इस पावन तट और उसके मंदिर के बारे में विस्तार से पढ़ें: सोमनाथ ज्योतिर्लिंग।

घटना और बढ़ना

चंद्र की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। पर उन्होंने दक्ष का शाप सीधे मिटाया नहीं। एक प्रजापति का वचन व्यर्थ नहीं जाता, और चंद्र की भूल भी सच्ची थी। शिव ने बीच का मार्ग निकाला: चंद्रमा एक पखवाड़े, यानी कृष्ण पक्ष में घटेंगे, और अगले पखवाड़े, यानी शुक्ल पक्ष में फिर बढ़ेंगे। चंद्र अपनी कांति खोएँगे और फिर पाएँगे, बार-बार, सदा के लिए।

इस दृष्टि से हर चांद्र मास यही कथा दोहराता है: कृष्ण पक्ष में शाप का असर, और शुक्ल पक्ष में शिव की कृपा से लौटता प्रकाश।

शिव के मस्तक पर चंद्रकला

इसके बाद शिव ने चंद्रकला को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। इसी से वे चंद्रशेखर कहलाए, यानी "जिनके मस्तक का आभूषण चंद्रमा है", और सोमनाथ, यानी "चंद्रमा के स्वामी"। कहा जाता है कि कृतज्ञ चंद्र ने प्रभास में पहला मंदिर बनवाया, और वहाँ का ज्योतिर्लिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।

सोमवार चंद्रमा का दिन है और शिव को समर्पित है, विशेष रूप से श्रावण मास में, जब भक्त सावन सोमवार का व्रत रखते हैं।

यह कथा कहाँ-कहाँ मिलती है

यह किसी एक ग्रंथ की स्थिर कथा नहीं है। यह कई जगह मिलती है, और विवरण में अंतर भी हैं:

  • तैत्तिरीय संहिता (कृष्ण यजुर्वेद): एक प्राचीन रूप, जिसमें प्रजापति अपनी पुत्रियाँ राजा सोम को देते हैं, सोम रोहिणी को अधिक चाहते हैं और रोगग्रस्त हो जाते हैं। यहाँ पुत्रियों की संख्या तैंतीस बताई गई है, और कथा एक आरोग्य-अनुष्ठान की व्याख्या करती है।
  • महाभारत: शल्य पर्व में बलराम की प्रभास तीर्थयात्रा के प्रसंग में सोम के शाप और वहाँ स्नान से उनके रोगमुक्त होने की कथा आती है।
  • शिव पुराण और स्कंद पुराण: सोमनाथ वाला रूप, जिसमें चंद्र प्रभास में शिव की आराधना करते हैं और ज्योतिर्लिंग की स्थापना होती है।
  • भागवत पुराण: दक्ष की पुत्रियों और उनके विवाहों का वर्णन, जिनमें सोम को दी गई सत्ताईस पुत्रियाँ भी हैं।

चंद्र केवल शिव-कृपा से स्वस्थ हुए, प्रभास में स्नान से, या दोनों से, यह ग्रंथ-ग्रंथ में बदलता है। पर कथा का मर्म एक ही है: टूटा वचन, शाप, तपस्या, और वह समझौता जिसे चंद्रमा आज भी हर महीने जीता है।

27 नक्षत्र: नाम, देवता और स्वामी ग्रह

सत्ताईस पत्नियाँ ही सत्ताईस नक्षत्र हैं। हर नक्षत्र के एक अधिष्ठाता देवता हैं, जो तैत्तिरीय संहिता और ब्राह्मण जैसी वैदिक सूचियों से आते हैं, और बाद के ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा पद्धति के अनुसार एक स्वामी ग्रह भी। नीचे की तालिका मानक सूचियों पर आधारित है। कुछ ग्रंथों में कुछ देवताओं के नाम अलग मिलते हैं; जैसे चित्रा के देवता त्वष्टा को प्रायः देव-शिल्पी विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।

क्रम नक्षत्र अधिष्ठाता देवता स्वामी ग्रह (विंशोत्तरी)
1 अश्विनी अश्विनी कुमार केतु
2 भरणी यम शुक्र
3 कृत्तिका अग्नि सूर्य
4 रोहिणी प्रजापति (ब्रह्मा) चंद्र
5 मृगशिरा सोम मंगल
6 आर्द्रा रुद्र राहु
7 पुनर्वसु अदिति बृहस्पति (गुरु)
8 पुष्य बृहस्पति शनि
9 आश्लेषा सर्प (नाग) बुध
10 मघा पितर केतु
11 पूर्वा फाल्गुनी भग शुक्र
12 उत्तरा फाल्गुनी अर्यमा सूर्य
13 हस्त सविता चंद्र
14 चित्रा त्वष्टा (विश्वकर्मा) मंगल
15 स्वाति वायु राहु
16 विशाखा इंद्र और अग्नि बृहस्पति
17 अनुराधा मित्र शनि
18 ज्येष्ठा इंद्र बुध
19 मूल निऋति केतु
20 पूर्वाषाढ़ा आपः (जल) शुक्र
21 उत्तराषाढ़ा विश्वेदेव सूर्य
22 श्रवण विष्णु चंद्र
23 धनिष्ठा अष्ट वसु मंगल
24 शतभिषा वरुण राहु
25 पूर्वा भाद्रपद अज एकपाद बृहस्पति
26 उत्तरा भाद्रपद अहिर्बुध्न्य शनि
27 रेवती पूषा बुध

अंतिम स्तंभ को ध्यान से देखिए। नौ ग्रह एक ही क्रम में तीन बार दोहराते हैं: केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, बृहस्पति, शनि, बुध। यही क्रम विंशोत्तरी दशा की रीढ़ है, जो जीवन के 120 वर्षों को ग्रहों की दशाओं में बाँटती है, और जिसकी शुरुआत जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से होती है।

कथा के पीछे का खगोलविज्ञान

नाक्षत्र मास: लगभग 27.3 दिन

स्थिर तारों के सापेक्ष चंद्रमा लगभग 27.32 दिन बाद उसी स्थान पर लौट आता है। खगोलविज्ञान में इसे नाक्षत्र मास (sidereal month) कहते हैं। चंद्रमा के मार्ग को 27 बराबर भागों में बाँटें, तो वह लगभग हर दिन एक भाग पार करता है। कथा के भीतर यही सीधा-सा अवलोकन है: हर पत्नी के साथ एक रात।

चंद्रमा की गति पूरी तरह एक-सी नहीं रहती। उसकी कक्षा थोड़ी अंडाकार है, इसलिए वह एक दिन में लगभग 12 से 15 अंश चलता है, और किसी नक्षत्र में उसका ठहराव एक दिन से थोड़ा कम या अधिक हो सकता है। पंचांग इसका सटीक समय बताता है।

हर नक्षत्र 13°20′ का

360 अंश के पूरे वृत्त को 27 से भाग दें तो हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है। हर नक्षत्र के चार चरण (पाद) होते हैं, प्रत्येक 3°20′ का, यानी कुल 27 × 4 = 108 चरण। इसी वृत्त पर 30-30 अंश की बारह राशियाँ भी हैं, इसलिए हर राशि में ठीक नौ चरण, यानी सवा दो नक्षत्र आते हैं।

27 ही क्यों, और 28वाँ नक्षत्र अभिजीत

नाक्षत्र मास 27 के बजाय 27⅓ दिन के अधिक निकट है, इसलिए कुछ प्राचीन सूचियों में एक अट्ठाईसवाँ नक्षत्र अभिजीत भी जोड़ा गया, जिसका तारा चमकीला वेगा (Vega) है। अथर्ववेद की नक्षत्र-सूची में यह शामिल है। पर अभिजीत चंद्रमा के मार्ग से काफ़ी उत्तर में है, इसलिए बाद की पद्धतियों ने 27 समान भाग ही अपनाए। आज अभिजीत उत्तराषाढ़ा के अंतिम और श्रवण के आरंभिक अंश से बने एक छोटे खंड के रूप में बचा है, जिसका उपयोग कुछ मुहूर्त गणनाओं में होता है।

कलाओं की घड़ी अलग है

यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है। चंद्रमा का घटना-बढ़ना इस बात पर निर्भर नहीं कि वह किस नक्षत्र में है। कलाएँ सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा के बीच बदलते कोण से बनती हैं और हर 29.53 दिन में दोहराती हैं, जिसे चांद्र मास (synodic month) कहते हैं। इतने समय में पृथ्वी भी अपनी कक्षा में आगे बढ़ चुकी होती है, इसलिए सूर्य के साथ फिर से वही स्थिति बनाने के लिए चंद्रमा को लगभग दो दिन और लगते हैं।

इसीलिए हर महीने पूर्णिमा एक अलग नक्षत्र में पड़ती है, हर बार लगभग दो नक्षत्र आगे। कथा दो सच्चे चक्रों को एक चित्र में जोड़ देती है: 27 पत्नियों के बीच चंद्रमा की यात्रा, और हर महीने उसके प्रकाश का खोना और लौटना।

रोहिणी और एल्डेबरन तारा

रोहिणी नक्षत्र का प्रमुख तारा एल्डेबरन है, वृषभ तारामंडल में बैल की नारंगी-लाल "आँख", जो हायडीज़ तारागुच्छ के बीच दिखता है। चंद्रमा के मार्ग के पास स्थित गिने-चुने सबसे चमकीले तारों में यह एक है, और कुछ कालखंडों में चंद्रमा ठीक इसके सामने से गुज़रकर इसे कुछ समय के लिए ढक लेता है, जिसे खगोलविज्ञान में आच्छादन (occultation) कहते हैं। नाम भी सटीक है: रोहिणी का अर्थ है "लाल आभा वाली"।

ज्योतिष में रोहिणी के स्वामी स्वयं चंद्र हैं, और रोहिणी को समेटे वृषभ राशि में चंद्रमा उच्च के माने जाते हैं। समझना कठिन नहीं कि कथाकारों ने रोहिणी को ही चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी क्यों चुना।

दूसरे नक्षत्रों को भी परिचित तारों से पहचाना जा सकता है। कृत्तिका प्लेयडीज़ (सप्तमातृका या कचपचिया) है, आर्द्रा बीटलज्यूज़, पुनर्वसु कैस्टर और पोलक्स, मघा रेगुलस, चित्रा स्पाइका, स्वाति आर्कटुरस, ज्येष्ठा एंटारीज़, और श्रवण अल्टेयर।

वैदिक खगोलविज्ञान में नक्षत्र

नक्षत्र भारत के सबसे प्राचीन खगोलीय विचारों में से हैं। ऋग्वेद का विवाह-सूक्त (10.85) नक्षत्रों के बीच स्थित सोम की बात करता है, और यजुर्वेद के ग्रंथ यज्ञ के लिए नक्षत्रों को उनके देवताओं सहित गिनाते हैं। वैदिक यज्ञ सही समय पर होने चाहिए थे, इसलिए ऋषियों को आकाश का एक भरोसेमंद पंचांग चाहिए था, और नक्षत्रों से होकर चंद्रमा की नियमित गति ने यह दिया।

काल-गणना पर समर्पित सबसे पुराना उपलब्ध भारतीय ग्रंथ वेदांग ज्योतिष है, जिसे महर्षि लगध से जोड़ा जाता है और जो ऋग्वेदीय व यजुर्वेदीय दो पाठों में मिलता है। इसमें नक्षत्रों और सूर्य-चंद्र की स्थितियों के आधार पर यज्ञों का समय तय करने के लिए पाँच वर्ष का युग-चक्र बनाया गया है। इसके काल पर विद्वान एकमत नहीं हैं; इसमें वर्णित अयनांत-स्थितियों के आधार पर कई अनुमान इसे ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के उत्तरार्ध में रखते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे बाद का मानते हैं।

एक बात दिखाती है कि नक्षत्रों का अवलोकन कितने लंबे समय से होता रहा है। पुरानी वैदिक सूचियाँ कृत्तिका से शुरू होती हैं, जबकि बाद की सूचियाँ अश्विनी से। यह बदलाव अयन-चलन (precession) के कारण हुआ, यानी पृथ्वी की धुरी का वह धीमा डोलना जिससे विषुव बिंदु तारों के सापेक्ष लगभग 72 वर्ष में एक अंश खिसक जाता है। भारतीय ज्योतिष नक्षत्रों को स्वयं तारों के सापेक्ष मापता है (निरयण पद्धति), जो आज पश्चिमी ज्योतिष की सायन पद्धति से लगभग 24 अंश अलग है।

आज नक्षत्रों का उपयोग कैसे होता है

बच्चे का नामकरण

नामकरण संस्कार में कई परिवार बच्चे का नाम उस अक्षर से रखते हैं जो उसके जन्म नक्षत्र के चरण को दिया गया है। जैसे अश्विनी के चार चरणों के अक्षर परंपरा से चू, चे, चो और ला माने जाते हैं। जन्म नक्षत्र विवाह के लिए कुंडली मिलान में भी देखा जाता है, और दक्षिण भारत में कई परिवार जन्मदिन तिथि या तारीख़ से नहीं, बल्कि जन्म-मास में जन्म नक्षत्र लौटने के दिन मनाते हैं, जिसे "नक्षत्र जन्मदिन" कहते हैं।

मुहूर्त

विवाह, गृह प्रवेश या यात्रा के शुभ समय का चुनाव बहुत कुछ उस दिन के नक्षत्र पर टिका है। स्वभाव के अनुसार नक्षत्रों के वर्ग बनाए गए हैं: रोहिणी और तीनों "उत्तरा" नक्षत्र ध्रुव या स्थिर कहलाते हैं, और नींव रखने जैसे स्थायी आरंभों के लिए शुभ माने जाते हैं। दिन के नक्षत्र और जन्म नक्षत्र का आपसी संबंध, जिसे ताराबल कहते हैं, भी देखा जाता है।

महीनों के नाम

हिंदू चांद्र पंचांग का हर महीना उस नक्षत्र के नाम पर है जिसके पास उसकी पूर्णिमा पड़ती है:

मास पूर्णिमा का नक्षत्र
चैत्र चित्रा
वैशाख विशाखा
ज्येष्ठ ज्येष्ठा
आषाढ़ पूर्वाषाढ़ा / उत्तराषाढ़ा
श्रावण श्रवण
भाद्रपद पूर्वा / उत्तरा भाद्रपद
आश्विन अश्विनी
कार्तिक कृत्तिका
मार्गशीर्ष मृगशिरा
पौष पुष्य
माघ मघा
फाल्गुन पूर्वा / उत्तरा फाल्गुनी

यानी जब भी हम कार्तिक पूर्णिमा या सावन सोमवार कहते हैं, तो चंद्रमा की किसी पत्नी का नाम ले रहे होते हैं।

नक्षत्रों से तय होने वाले पर्व

कई पर्व तिथि के साथ-साथ नक्षत्र से भी तय होते हैं:

  • कृष्ण जन्माष्टमी: परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी की आधी रात रोहिणी नक्षत्र में हुआ, और बहुत से भक्त दोनों के संयोग को विशेष मानते हैं। देखें हमारा जन्माष्टमी मार्गदर्शन।
  • ओणम: केरल का यह महापर्व चिंगम मास में तिरुवोणम, यानी श्रवण नक्षत्र के दिन अपने शिखर पर पहुँचता है। पढ़ें ओणम का गहरा अर्थ।
  • कार्तिगै दीपम: तमिलनाडु में कार्तिगै मास में जब चंद्रमा कृत्तिका में होता है, तब घर-घर दीप जलाए जाते हैं।
  • आरुद्रा दर्शनम: मार्गऴि मास में रुद्र के नक्षत्र आर्द्रा में नटराज शिव की उपासना होती है।
  • थैपूसम: थै मास में पुष्य (पूसम) नक्षत्र में मुरुगन के भक्त यह पर्व मनाते हैं।
  • राम नवमी: वाल्मीकि रामायण श्रीराम का जन्म नवमी तिथि और पुनर्वसु नक्षत्र में बताती है।

प्रतीक और सीख

न्याय एक पवित्र कर्तव्य है। चंद्र का दोष रोहिणी से प्रेम नहीं था, बल्कि टूटा हुआ वचन और उन लोगों की उपेक्षा था जो उन पर निर्भर थे। हर माता-पिता, शिक्षक या अगुआ के लिए यह चेतावनी है: पक्षपात घाव देता है, और वे घाव लौटकर आते हैं।

निजी भूल का असर सार्वजनिक होता है। चंद्रमा क्षीण हुए तो वनस्पतियाँ मुरझाईं और संसार पीड़ित हुआ। कथा व्यक्तिगत आचरण और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को जुड़ा हुआ मानती है, और यही धर्म की धारणा का भी सार है।

परिणाम नरम हो सकते हैं, मिटते नहीं। शिव ने शाप मिटाया नहीं, उसे अंत से चक्र में बदल दिया। कृपा का यह यथार्थ चित्र है: सच्चा पश्चाताप अतीत को हमेशा पलट नहीं देता, पर उसे सहने योग्य बना देता है।

कोई अंधकार स्थायी नहीं। हर अमावस्या के बाद नई चंद्रकला लौटती है। अनगिनत भक्तों के लिए बढ़ता चंद्रमा हर महीने की याद है कि हानि कहानी का अंत नहीं।

जो झुका, वही सम्मानित हुआ। शिव ने अपने मस्तक पर वही चंद्रमा धारण किया जो शापित और क्षीण हुआ था। जटाओं में चमकती चंद्रकला महादेव की उस करुणा का प्रतीक है जो शरण में आने वाले हर जीव के लिए है। त्रिदेवों में शिव के स्थान के बारे में और जानने के लिए पढ़ें सनातन धर्म की शाश्वत त्रिमूर्ति।

यह क्यों मायने रखता है

सूत्र भुला दिए जाते हैं, तालिकाएँ खो जाती हैं, पर कहानी बच्चों को सुनाई जाती है, त्योहारों पर गाई जाती है, मंदिर की दीवारों पर उकेरी जाती है, और किसी एक पांडुलिपि पर निर्भर हुए बिना हज़ारों वर्ष पार कर जाती है। इस कहानी के भीतर, फल में बीज की तरह, एक सटीक अवलोकन छिपा है:

चंद्रमा हर 27.3 दिन में उन्हीं तारों के पास लौटता है, आकाश के 27 क्षेत्रों से होकर।

ऋषि जानते थे। उन्होंने बस इसे काव्य के रूप में याद रखा।

एक अंतिम विचार

अगली बार जब आप चंद्रमा देखें, पूर्णिमा का हो, आधा हो, या भोर में लुप्त होती पतली कोर, तो एक क्षण रुकिए। देखिए कि उसके पास कौन-सा चमकीला तारा है। आज रात वह रोहिणी हो सकती है या चित्रा; एक सप्ताह बाद कोई और बहन।

और क्या आपका मन यह सोचने पर विवश नहीं होता:

  • हमारे पूर्वज इतने वर्षों तक आकाश का इतना सटीक नक्शा कैसे बना सके कि 27.3 दिन जैसा सूक्ष्म चक्र उभरकर सामने आ गया?
  • और इससे भी ज़रूरी, वे यह सब कर ही क्यों रहे थे? इस लंबे, धैर्यपूर्ण आकाश-अध्ययन के पीछे उनकी सोच और उद्देश्य क्या था?
  • और उन्होंने इसे कहानियों के रूप में जन-जन तक पहुँचाने का मार्ग क्यों चुना, किसी ऐसे रूप में दर्ज करने के बजाय जिसे केवल कुछ ही लोग समझ पाते?

शायद यह भी उनकी छोड़ी हुई बुद्धिमत्ता का एक हिस्सा है, जिसे ढूँढ़ना हम पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चंद्रमा की 27 पत्नियाँ कौन हैं?

वे प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियाँ हैं, जो आकाश के 27 नक्षत्र भी हैं: अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।

दक्ष ने चंद्रमा को शाप क्यों दिया?

चंद्र ने सभी 27 पत्नियों से समान व्यवहार का वचन दिया था, पर वे लगभग सारा समय रोहिणी के साथ ही बिताते थे। बाकी पुत्रियों की शिकायत पर दक्ष ने उन्हें समझाया, और जब चंद्र नहीं बदले तो उन्हें क्षय रोग का शाप दे दिया, जिससे उनकी कांति क्षीण होने लगी।

चंद्रमा दक्ष के शाप से कैसे मुक्त हुए?

सोमनाथ की परंपरा के अनुसार चंद्र ने गुजरात तट पर प्रभास क्षेत्र में कठोर तप करके भगवान शिव की आराधना की। शिव ने शाप को पूरी तरह नहीं मिटाया, पर उसे नरम कर दिया: चंद्रमा एक पक्ष में घटेंगे और दूसरे में फिर बढ़ेंगे। शिव ने चंद्रकला को अपने मस्तक पर धारण किया, इसलिए वे चंद्रशेखर कहलाते हैं।

रोहिणी को चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी क्यों कहा जाता है?

रोहिणी नक्षत्र का प्रमुख तारा एल्डेबरन है, जो वृषभ राशि में चंद्रमा के मार्ग के बहुत पास स्थित एक चमकीला लाल तारा है। चंद्रमा नियमित रूप से इसके निकट से गुज़रता है और कभी-कभी इसे ढक भी लेता है। ज्योतिष में रोहिणी के स्वामी स्वयं चंद्र हैं और वृषभ राशि में चंद्रमा उच्च के माने जाते हैं।

नक्षत्र 27 ही क्यों हैं, 28 क्यों नहीं?

चंद्रमा तारों के सापेक्ष लगभग 27.3 दिन में एक चक्कर पूरा करता है, इसलिए उसके मार्ग को 27 भागों में बाँटने पर हर दिन लगभग एक भाग आता है। अथर्ववेद जैसे कुछ प्राचीन ग्रंथों में अभिजीत को जोड़कर 28 नक्षत्र गिने गए हैं। बाद की पद्धति में 13 अंश 20 कला के 27 समान भाग तय हुए, पर अभिजीत का उपयोग आज भी कुछ मुहूर्त गणनाओं में होता है।

क्या चंद्रमा का घटना-बढ़ना नक्षत्रों से होकर गुज़रने के कारण होता है?

नहीं। चंद्र-कलाएँ सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा के बीच बदलते कोण से बनती हैं और हर 29.5 दिन (चांद्र मास) में दोहराती हैं। सभी 27 नक्षत्रों से होकर गुज़रने में लगभग 27.3 दिन (नाक्षत्र मास) लगते हैं। दोनों चक्र जुड़े हुए पर अलग हैं, इसीलिए हर महीने पूर्णिमा अलग नक्षत्र में पड़ती है।

कौन-से हिंदू महीने नक्षत्रों के नाम पर हैं?

सभी बारह। चांद्र मास का नाम उस नक्षत्र पर रखा जाता है जिसके पास उसकी पूर्णिमा पड़ती है: चैत्र (चित्रा), वैशाख (विशाखा), ज्येष्ठ (ज्येष्ठा), आषाढ़ (आषाढ़ा), श्रावण (श्रवण), भाद्रपद (भाद्रपद), आश्विन (अश्विनी), कार्तिक (कृत्तिका), मार्गशीर्ष (मृगशिरा), पौष (पुष्य), माघ (मघा) और फाल्गुन (फाल्गुनी)।

आज के जीवन में नक्षत्रों का उपयोग कैसे होता है?

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, उसी जन्म नक्षत्र से बच्चे के नाम का पहला अक्षर, विंशोत्तरी दशा और विवाह के लिए कुंडली मिलान तय होते हैं। विवाह और गृह प्रवेश के मुहूर्त में भी नक्षत्र देखा जाता है, और ओणम (तिरुवोणम) व कार्तिगै दीपम (कृत्तिका) जैसे अनेक पर्व नक्षत्रों से ही तय होते हैं।

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श्रावण मास 2027: उत्तर भारत में सोमवार, 19 जुलाई से, अमांत पंचांग में 3 अगस्त से। सावन सोमवार व्रत तिथियाँ, शिव पूजा विधि, मंत्र, व्रत आहार और आध्यात्मिक अर्थ।

अंशुल पात्रो
आधी रात के समय फूलों से सजे काठ के पालने में विराजे बाल कृष्ण, चारों ओर जगमगाते दीये, गेंदे की मालाएं, माखन की मटकी और घर में प्रवेश करते नन्हे चरण-चिह्न।
उत्सव18 मिनट

कृष्ण जन्माष्टमी: तिथि और पूजा

कृष्ण जन्माष्टमी 2027 बुधवार, 25 अगस्त को है। जानें निशिता पूजा मुहूर्त, व्रत-पारण के नियम, श्रीकृष्ण जन्म की कथा और इस मध्यरात्रि पर्व का गहरा अर्थ।

अंशुल पात्रो

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