जहाँ बारह की यात्रा पूर्ण होती है: गुफाओं के पास लाल पत्थर का मंदिर
सुबह-सुबह शहर से वेरूळ की ओर चलिए, तो रास्ता आपको कथा पहले ही सुना देता है। सबसे पहले मैदान के ऊपर देवगिरि का शंकु-सा पहाड़ी किला उठता है — वही देवगिरि, जिसके पास शिव पुराण के अनुसार सुधर्मा नामक ब्राह्मण अपनी दो पत्नियों के साथ रहता था। फिर सड़क चरणाद्रि की पहाड़ियों में चढ़ती है और दाहिनी ओर एलोरा की लंबी काली चट्टान खुल जाती है, जिसमें चार शताब्दियों में चौंतीस गुफाएँ काटी गईं। और फिर, बस एक किलोमीटर आगे, बेलपत्र और नारियल की दुकानों के बीच से एक गली मुड़ती है, और गाँव की छतों के ऊपर गहरे लाल पत्थर का शिखर दिखाई देता है। यही घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग है — परंपरा में बारह ज्योतिर्लिंगों में बारहवाँ और अंतिम, और इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार सबसे छोटा भी।
यह मंदिर एक साथ बहुत प्राचीन और काफ़ी नया है। इसका ज्योतिर्लिंग शिव पुराण में और, महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार, स्कंद पुराण में भी नामित है; पर जिस भवन में आप प्रवेश करते हैं, वह मुख्यतः सोलहवीं और अठारहवीं शताब्दी में दक्खन के दो सबसे प्रभावशाली हिंदू शासकों ने खड़ा किया — छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले और इंदौर की अहिल्याबाई होलकर ने। यह महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर ज़िले — जिस शहर और ज़िले का पूर्व नाम औरंगाबाद था — की खुलताबाद तहसील के वेरूळ गाँव में है, शहर से लगभग 30 किमी उत्तर-पश्चिम, और एलोरा की गुफाओं से पैदल दूरी पर। हमारी शृंखला के महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंगों में एक वन में है और एक नदी के उद्गम पर; यह तीसरा एक विश्व धरोहर स्थल के पड़ोस में है।
यह हमारी साप्ताहिक शृंखला "12 सोमवार, 12 ज्योतिर्लिंग" का लेख #12 — और अंतिम लेख है। सोमनाथ के समुद्र, श्रीशैलम की पहाड़ियों, उज्जैन के घाटों, नर्मदा के द्वीप, केदारनाथ की बर्फ, भीमाशंकर के वन, काशी की गलियों, त्र्यंबकेश्वर के नदी-उद्गम, बैद्यनाथ के वैद्य-प्रांगण, नागेश्वर के भूमिगत गर्भगृह और रामेश्वरम के समुद्र-तट के बाद यह यात्रा वेरूळ में विराम लेती है — वहीं, जहाँ स्तोत्र स्वयं विराम लेता है। सभी बारह धामों को आप हमारे 12 ज्योतिर्लिंग शृंखला पृष्ठ पर फिर से देख सकते हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग एक नज़र में
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| मंदिर | घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) ज्योतिर्लिंग मंदिर, वेरूळ – 431102, खुलताबाद तहसील, छत्रपति संभाजीनगर ज़िला |
| आराध्य | भगवान शिव घृष्णेश्वर / घुश्मेश्वर रूप में — शिव पुराण की अपनी व्युत्पत्ति में "घुश्मा के ईश" |
| धार्मिक महत्त्व | 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक; द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में अंतिम — घुश्मेशं च शिवालये — स्तोत्र के क्रम में बारहवाँ और हमारी शृंखला में #12 |
| शास्त्रीय आधार | शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 32–33; महाराष्ट्र पर्यटन स्कंद पुराण का भी उल्लेख करता है |
| स्थान | वेरूळ गाँव, छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व औरंगाबाद) शहर से लगभग 30–31 किमी उत्तर-पश्चिम; एलोरा की गुफाओं से लगभग 1–1.5 किमी |
| मंदिर का स्वरूप | हेमाडपंती शैली में लाल ज्वालामुखीय पत्थर; पाँच स्तरों का नक़्क़ाशीदार शिखर; 24 स्तंभों का सभामंडप और नंदी; पूर्वाभिमुख ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र पर्यटन) |
| पुनर्निर्माण | 16वीं शताब्दी में मालोजी भोसले; 18वीं शताब्दी का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर के नाम (महाराष्ट्र पर्यटन) |
| पावन जल | शिवालय तीर्थ — कथा का सरोवर; इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार मंदिर परिसर के भीतर का कुंड |
| महापर्व | महाशिवरात्रि (फ़रवरी–मार्च); श्रावण के सोमवार |
| निकटतम रेलवे स्टेशन | छत्रपति संभाजीनगर (CPSN, पूर्व औरंगाबाद AWB), लगभग 29 किमी |
| निकटतम हवाई अड्डा | चिकलठाणा हवाई अड्डा, छत्रपति संभाजीनगर (IXU) — अलग-अलग आधिकारिक पृष्ठों पर लगभग 36–40 किमी |
"घृष्णेश्वर" नाम का अर्थ: एक नाम, अनेक वर्तनियाँ
शिव पुराण स्वयं इस नाम की व्युत्पत्ति देता है, और बारहों में यह सबसे कोमल व्युत्पत्ति है। जब शिव ने वहाँ रहना स्वीकार किया, तो उन्होंने भक्त घुश्मा से कोटिरुद्र संहिता के शब्दों में कहा — "मैं यहाँ तुम्हारे नाम से रहूँगा; मेरा नाम घुश्मेश होगा।" घुश्मा + ईश = घुश्मेश, अर्थात् घुश्मा के ईश — बारह ज्योतिर्लिंगों में यही एकमात्र है, जिसका नाम एक स्त्री-भक्त के नाम पर पड़ा। नाम के बाक़ी सभी रूप इसी एक से निकले हैं।
और निकले भी कई भाषाओं से होकर। घुश्मेश्वर पुराण का ही रूप है, जिसमें ईश के स्थान पर ईश्वर है। घृष्णेश्वर वह रूप है जो मराठी में और फिर हिंदी में जम गया, और यही नाम आज मंदिर के बोर्डों पर है। अंग्रेज़ी में सरकारी पृष्ठ इन रूपों का प्रयोग बेतरतीब ढंग से करते हैं: महाराष्ट्र पर्यटन अपने पृष्ठ के शीर्षक में Ghrishneshwar और पाठ में Grishneshwar लिखता है; इनक्रेडिबल इंडिया Grishneshwar; ज़िला प्रशासन एक शीर्षक में Ghrishneshwar और अगली ही पंक्ति में Grushneshwar। कुछ गौण लेखन में घृष्णेश्वर का अर्थ "करुणा के ईश्वर" दिया गया है — कथा को देखते हुए मनोहर है, पर हम इसे किसी ग्रंथ तक नहीं पहुँचा सके; इसलिए इसे व्युत्पत्ति नहीं, भक्ति की व्याख्या मानिए।
गाँव के नाम पर एक बात। वेरूळ मराठी नाम है, और यूनेस्को अपने विवरण में इसी को दर्ज करता है — खुलताबाद तालुका, वेरूळ गाँव। एलोरा उसी स्थान का अंग्रेज़ी रूप है, जो आज बोलचाल में केवल गुफाओं के लिए रह गया है। कोई "एलोरा का मंदिर" कहे या "वेरूळ का मंदिर" — दोनों का आशय वही लाल शिखर है।
स्तोत्र में बारहवाँ, हमारी यात्रा में भी बारहवाँ
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करने वाला हर शिवभक्त अपना पाठ यहीं समाप्त करता है:
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये — हिमालय में केदार, और शिवालय में घुश्मेश। तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं। स्तोत्र इस ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश कहता है — पुराण का रूप। यह स्थान किसी नगर का नहीं, शिवालय का देता है — और यही नाम पुराण कथा के पावन सरोवर को देता है, जैसा आगे देखेंगे। और यह घुश्मेश को अंत में रखता है। स्तोत्र का क्रम पवित्रता की श्रेणी नहीं है, और हमारी शृंखला ने हर उस पड़ाव पर यह कहा है जहाँ दोनों क्रम भिन्न थे; पर घृष्णेश्वर पर आकर स्तोत्र का क्रम और हमारा क्रम अंततः मिल जाते हैं। यह स्तोत्र में बारहवाँ है, शिव पुराण के वर्णन में बारहवाँ, और हमारी सोमवारी यात्रा में भी बारहवाँ।
एक क्षेत्रीय गणना पर भी एक बात। ज़िला प्रशासन घृष्णेश्वर को महाराष्ट्र के पाँच ज्योतिर्लिंगों में से एक बताता है। राज्य में गिनती ऐसी ही होती है: भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर, जिनके स्थान पर कोई विवाद नहीं; और साथ में हिंगोली ज़िले का औंढा नागनाथ, जिसे नागेश्वर माना जाता है, तथा बीड ज़िले का परली वैजनाथ, जिसे वैद्यनाथ। हमारी शृंखला द्वारका के निकट नागेश्वर और देवघर के बैद्यनाथ गई, और उन लेखों में हमने बताया कि अलग-अलग क्षेत्र एक ही श्लोक को अलग-अलग क्यों पढ़ते हैं। कोई पाठ दूसरे को रद्द नहीं करता। महाराष्ट्र के पाँच पूरे करने वाला भक्त और हमारे बारह पूरे करने वाला भक्त — दोनों ने वही किया है जो स्तोत्र कहता है।
कथा: घुश्मा, सुधर्मा और सुदेहा
आगे जो है, वह पावन परंपरा है, और परंपरा के रूप में ही कही गई है। शिव पुराण इसे कोटिरुद्र संहिता के दो अध्यायों में कहता है — बत्तीसवाँ, सुदेहा और सुधर्मा पर; और तैंतीसवाँ, ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर की उत्पत्ति पर। कोई आधिकारिक पृष्ठ इससे पूरा रूप नहीं देता, और ऐसी कथा की पुष्टि या खंडन कोई ऐतिहासिक अभिलेख नहीं कर सकता। हम इसे वैसे ही कहते हैं जैसे पुराण कहता है, और इसके कठिन अंश को छोटा नहीं करते।
दक्षिण देश में, देवगिरि नामक पर्वत के पास — जिसे मानक अंग्रेज़ी अनुवाद की पाद-टिप्पणी दौलताबाद से जोड़ती है, वही किले वाला पहाड़ जो वेरूळ के रास्ते में पड़ता है — भारद्वाज गोत्र का सुधर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी सुदेहा पति-परायणा और शिव-भक्त थी, पर उन्हें कोई संतान नहीं थी। पुराण इस दुःख को मानवीय चेहरा देता है: एक पड़ोसिन ने सुदेहा को बाँझ कहकर ताना दिया, और उसने घर आकर पति से कहा कि यदि किसी तरह पुत्र न हुआ तो वह देह त्याग देगी। सुधर्मा टालता रहा; वह गिड़गिड़ाती रही; अंत में उसने उसकी योजना मान ली और सुदेहा की छोटी बहन घुश्मा से विवाह किया।
घुश्मा एक विशेष प्रकार की भक्त थी। वह प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाती — मिट्टी से गढ़े लिंग — हर एक की पूजा करती, और फिर उन्हें पास के सरोवर में ले जाकर विसर्जित कर देती। यह क्रम उसने तब तक चलाया जब तक एक लाख लिंगों का निर्माण और पूजन पूरा न हो गया। तब शिव की कृपा से उसे पुत्र हुआ — सुंदर, भाग्यवान, सब शुभ गुणों से युक्त, ऐसा पाठ कहता है। बालक बड़ा हुआ और उसका विवाह हुआ।
और सुदेहा का मन बदल गया। पुराण कहता है कि उसकी ईर्ष्या "आग की तरह भड़क उठी"। जिस उदारता से उसने बहन को घर लाया था, वही अब इस कुढ़न में बदल गई कि बहन के पास वह है जो उसके पास नहीं। एक रात उसने सोते हुए युवक पर छुरी चलाई, उसकी हत्या की, शव के टुकड़े किए और उन्हें उसी सरोवर में फेंक दिया जिसमें घुश्मा के लिंग पड़े थे। सुबह युवक की पत्नी ने बिस्तर पर रक्त देखा और रोती हुई सास के पास भागी।
यही कथा का केंद्र है। घुश्मा रुकी नहीं। समाचार सुनकर, पुराण कहता है, उसने "शोक का कोई चिह्न नहीं दिखाया"; उसका मन वहीं रहा जहाँ सदा रहता था। उसने उस दिन के एक सौ एक लिंग बनाए, उनकी पूजा की, और शिव के नामों का जप करते हुए उन्हें विसर्जित करने सरोवर की ओर चली — जैसे वर्षों से हर सुबह चलती थी। उसका तर्क एक ही पंक्ति में है: जिसने यह बालक दिया है, वही इसकी रक्षा भी करेगा। जब वह जल से मुड़ी, तो उसका पुत्र सरोवर के तट पर खड़ा था, जीवित।
तब शिव उसके सम्मुख प्रकट हुए और वर देने को कहा — और उसी साँस में बताया कि उसकी बहन ने क्या किया है, और सुदेहा को मारने के लिए त्रिशूल उठाया। घुश्मा का उत्तर ही इस मंदिर के होने का कारण है। उसने माँगा कि उसकी बहन को क्षमा किया जाए। उसका तर्क, जैसा पुराण दर्ज करता है, यह है कि जो अपने साथ बुरा करने वाले का भला करता है, उसके दर्शन मात्र से पाप दूर हो जाता है — और वह न्याय पूरा होते देखने से अधिक ऐसी ही मनुष्य होना चाहती है। शिव मान गए। फिर उसने एक बात और माँगी: कि वे संसार की रक्षा के लिए वहीं रहें, और उसके नाम से जाने जाएँ। "मैं यहाँ तुम्हारे नाम से रहूँगा," उन्होंने कहा। "मेरा नाम घुश्मेश होगा।" और वह सरोवर, पाठ कहता है, अब से शिवालय — शिव का आलय — कहलाएगा।
एक कथा, अनेक रूप
हर जीवित कथा की तरह यह भी एक से अधिक रूपों में कही गई है, और ईमानदारी कहती है कि इसे स्वीकार किया जाए।
- घुश्मा या कुसुमा? शिव पुराण भक्त का नाम घुश्मा देता है। इनक्रेडिबल इंडिया का पृष्ठ एक बहुत छोटी कथा कहता है, जिसमें कुसुमा नामक श्रद्धालु स्त्री इमली के पेड़ के नीचे एक लिंग की पूजा करती है और एक मधुमक्खी उस पर मधु डालती है, जिसके बाद लिंग स्वयं शिव बन जाता है। मराठी लोककथाओं में कुसुमा नाम व्यापक है, और वहाँ कुसुमा और घुश्मा एक ही स्त्री मानी जाती हैं। मधुमक्खी और इमली हमें और कहीं नहीं मिली; हम इसे मंत्रालय का कथन मानकर दर्ज करते हैं।
- छुरी या डुबाना? पुराण स्पष्ट कहता है कि सुदेहा ने भानजे की हत्या छुरी से की और शव के टुकड़े करके सरोवर में फेंके। अधिकतर लोक-कथन इसे डुबाने तक नरम कर देते हैं, और बहुत-से पुत्रवधू को छोड़ ही देते हैं। नरम रूप से शिक्षा में कोई कमी नहीं आती, पर पाठ यह नहीं कहता।
- कौन-सा पुराण? महाराष्ट्र पर्यटन शिव पुराण और स्कंद पुराण दोनों का उल्लेख करता है; कुछ गौण विवरण पद्म पुराण के नाम पर भी एक रूप बताते हैं, जिसमें भक्त का नाम घृष्णा है। हमने केवल शिव पुराण का पाठ ही जाँचा।
- देवगिरि कहाँ था? पुराण नाम देता है; अनुवाद की पाद-टिप्पणी दौलताबाद की ओर संकेत करती है, जो शहर से लगभग 16 किमी और वेरूळ से काफ़ी पहले है। पुराण का देवगिरि वही पहाड़ है या इस पूरे क्षेत्र का सामान्य नाम — यह कोई सिद्ध नहीं कर सकता। इतना पर्याप्त है कि परंपरा ने इस कथा को सदा इन्हीं पहाड़ियों के देश में रखा है।
हर रूप में जो बात समान है, वही महत्त्व की है: एक स्त्री, जो अपने जीवन की सबसे कठिन सुबह भी अपनी नित्य पूजा नहीं छोड़ती; और जिसे स्वयं ईश्वर प्रतिशोध देने आते हैं, तो वह उसके बदले क्षमा माँगती है। इसे पकड़े रहिए, तो विवरणों का भेद आपकी भक्ति को ज़रा भी विचलित न करेगा।
शिवालय तीर्थ: कथा का सरोवर
जिस सरोवर में घुश्मा अपने लिंग विसर्जित करती थी, उसे पुराण में शिव स्वयं नया नाम देते हैं — शिवालय, शिव का आलय — और स्तोत्र ज्योतिर्लिंग का पता इसी से बताता है: घुश्मेशं च शिवालये। आज मंदिर परिसर के भीतर या उसके पास का एक कुंड शिवालय तीर्थ नाम से जाना जाता है। इनक्रेडिबल इंडिया इसे "मंदिर परिसर के भीतर का पवित्र कुंड, शिवालय तीर्थ" कहता है, और महाराष्ट्र पर्यटन दर्ज करता है कि श्रद्धालु गर्भगृह में जाने से पहले पवित्र कुंड में स्नान करते हैं और मानते हैं कि इससे वे शुद्ध होते हैं।
पुराण इससे वचन भी जोड़ता है। शिव कहते हैं कि यह सरोवर दर्शन मात्र से कामनाएँ पूर्ण करेगा, और घुश्मेश की पूजा करने वाले सांसारिक सुख और मोक्ष पाते हैं। ये परंपरा के वचन हैं, और वचन के रूप में ही कहे गए हैं। भक्त इन्हें श्रद्धा में धारण करता है; यह लेख इनके आधार पर यह दावा नहीं करता कि जल किसी देह या किसी जीवन पर क्या प्रभाव डालता है। जो हमने रामेश्वरम के बाईस तीर्थों और बैद्यनाथ के वैद्य-प्रांगण में कहा था, वही यहाँ भी कहते हैं: कोई स्नान और कोई दर्शन उपचार नहीं है, और किसी लेख को इसका दिखावा नहीं करना चाहिए। अस्वस्थ हैं तो चिकित्सक से मिलिए, और फिर चाहें तो वेरूळ जाइए।
स्रोतों के मौन से एक व्यावहारिक सावधानी निकलती है। कोई आधिकारिक पृष्ठ यह नहीं बताता कि कुंड में स्नान वर्तमान में अनुमत है या नहीं, वह घाट है या दीवारों से घिरा जलाशय, और सूखे महीनों में उसकी दशा क्या रहती है। मंदिर में पूछिए, और ऐसे किसी जल में न उतरिए जिसमें स्थानीय लोग न उतर रहे हों।
प्रमाणित इतिहास: राष्ट्रकूट, मालोजी भोसले और अहिल्याबाई होलकर
इस खंड को दो सावधानियाँ तय करती हैं। पहली: मंदिर के कोई शिलालेख, अभिलेख या आधिकारिक इतिहास हमें प्रकाशित रूप में नहीं मिले — ट्रस्ट की कोई वेबसाइट प्रतीत नहीं होती, और मंदिर का वर्णन करने वाले सरकारी पृष्ठ किसी दस्तावेज़ का हवाला नहीं देते। दूसरी: सरकारी पृष्ठ परस्पर असहमत हैं। हम मतभेदों को छापते हैं, उनका औसत नहीं निकालते।
प्राचीनता। इनक्रेडिबल इंडिया कहता है कि मंदिर का निर्माण "6वीं शताब्दी में, प्रतापी राष्ट्रकूट वंश के शासनकाल में" आरंभ हुआ और अठारहवीं शताब्दी में पूर्ण। इस तिथि को सावधानी से लें: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एलोरा में राष्ट्रकूट गतिविधि को आठवीं शताब्दी के मध्य में रखता है — गुफा 15 का दंतिदुर्ग का अभिलेख लगभग 753–757 ई. का है और कैलास का श्रेय कृष्ण प्रथम (लगभग 757–783 ई.) को दिया जाता है — और कोई स्रोत घृष्णेश्वर के किसी राष्ट्रकूट संरक्षक का नाम नहीं लेता। जो सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है वह यह है कि वेरूळ में शिव मंदिर संभवतः उतना ही पुराना है जितनी उसके पास की हिंदू गुफाएँ, और जो पुराण इसका नाम लेता है, वह अपने वर्तमान रूप में मराठों से बहुत पहले संकलित हुआ था।
विध्वंस। महाराष्ट्र पर्यटन दर्ज करता है कि मंदिर ने "13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के अधीन विध्वंस सहित अनेक संकट" देखे — वही शताब्दियाँ जिनमें देवगिरि अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाओं के हाथ गया और मुहम्मद बिन तुग़लक़ के अधीन दौलताबाद कहलाया, जिसने 1327 में अपनी राजधानी वहाँ ले जाने का प्रयास किया। कोई स्रोत विध्वंस की तिथि इससे अधिक सटीक नहीं देता, और कोई यह नहीं बताता कि उससे पहले यहाँ क्या खड़ा था।
मालोजी भोसले, सोलहवीं शताब्दी। अभिलिखित पहला पुनर्निर्माण मालोजी भोसले का है — महाराष्ट्र पर्यटन के शब्दों में "प्रसिद्ध मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा"। मराठा परंपरा भोसले परिवार को वेरूळ से गहराई से जोड़ती है, और एक प्रिय लोककथा कहती है कि मालोजी को गाँव के पास गड़ा धन मिला, जिसे उन्होंने मंदिर और उसके कुंड पर लगाया। संबंध ऐतिहासिक है; धन की कथा परंपरा है, और हम उसे वैसा ही अंकित करते हैं। कोई सरकारी पृष्ठ इस कार्य का वर्ष नहीं देता।
अहिल्याबाई होलकर, अठारहवीं शताब्दी। मंदिर की "वर्तमान भव्यता", महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार, "इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर के 18वीं शताब्दी के जीर्णोद्धार प्रयासों की देन" है — वही शासिका जिनसे हमारी शृंखला सोमनाथ, काशी विश्वनाथ और ओंकारेश्वर में मिली, और जिनके कारण बारह में से इतने मंदिर आज जैसे दिखते हैं, वैसे दिखते हैं। यहाँ भी बारीक अक्षर पढ़िए: कुछ गौण विवरण अहिल्याबाई की सास गौतमाबाई होलकर का नाम और 1729 का वर्ष देते हैं, जो एक पीढ़ी पहले और अहिल्याबाई के शासन (1767–1795) से पूर्व होगा। हो सकता है दोनों बातें कार्य के अलग-अलग चरणों के लिए आंशिक रूप से सही हों। ट्रस्ट के अपने अभिलेखों के बिना हम केवल यही कह सकते हैं कि आज का मंदिर मालोजी की नींव पर होलकर-काल का भवन है, और अहिल्याबाई वह नाम है जो राज्य का पर्यटन विभाग स्वयं इसे देता है।
संरक्षण। कुछ क्षेत्रीय विवरण मंदिर को राष्ट्रीय संरक्षित स्थल कहते हैं, पर ज़िले के केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की किसी प्रकाशित ASI सूची में हम इसे नहीं पा सके, और हमने जो आधिकारिक पृष्ठ देखे उनमें से कोई इसकी संरक्षण-स्थिति नहीं बताता। इसके पास की एलोरा की गुफाओं का प्रबंधन ASI करता है, और यूनेस्को ने उन्हें 1983 में मानदंड (i), (iii) और (vi) के अंतर्गत विश्व धरोहर घोषित किया। मंदिर स्वयं एक जीवित उपासना-स्थल है, जिसे एक मंदिर ट्रस्ट चलाता है — इसीलिए इसके नियम ट्रस्ट के ही बनाए होते हैं।
आज का मंदिर: लाल पत्थर, पाँच स्तर और चौबीस स्तंभ
आज मंदिर में जो कुछ दिखता है, वह महाराष्ट्र पर्यटन के पृष्ठ के एक अनुच्छेद में वर्णित है, और उसे ध्यान से पढ़ना चाहिए।
पत्थर। मंदिर "आकर्षक लाल ज्वालामुखीय पत्थर से निर्मित" है — वही दक्खन का बेसाल्ट जिससे बग़ल की गुफाएँ काटी गईं; यहाँ उसे खोखला करने के बजाय खोदकर, तराशकर, ब्लॉकों में चुना गया है। सुबह और देर दोपहर की रोशनी में इसका रंग भीगी ईंट जैसा गहरा हो जाता है — इसीलिए यह मंदिर अलग-अलग घंटों में इतना अलग दिखता है।
शैली। महाराष्ट्र पर्यटन इसे हेमाडपंती कहता है — दक्खन की एक शैली, "जिसकी पहचान सूक्ष्म नक़्क़ाशी और सुदृढ़ संरचनाएँ हैं"; नाम हेमाडपंत से, जो तेरहवीं शताब्दी में देवगिरि के यादव राजाओं के मंत्री थे। इसकी विशेषता बिना चूने-गारे के जोड़े गए तराशे पत्थर हैं। इनक्रेडिबल इंडिया इसके बजाय "दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय शैलियों का विस्मयकारी मेल" कहता है — यह विरोध नहीं, बस अलग शब्दावली है: दक्खन का मंदिर दोनों बड़ी परंपराओं के बीच बैठता है और दोनों से लेता है।
शिखर। मंदिर में "पाँच स्तरों का शिखर है, जिस पर विविध देवताओं और पौराणिक प्रसंगों की सूक्ष्म मूर्तियाँ हैं"। यात्री और गौण विवरण बाहरी दीवारों पर लाल पत्थर में उकेरे दशावतार — विष्णु के दस अवतारों — के फलक बताते हैं; उस गुफा-समूह के पास यह उचित ही है, जिसकी गुफा 15 का नाम स्वयं दशावतार है।
सभामंडप। परिसर के भीतर "24 स्तंभों पर टिका विशाल सभामंडप है, हर स्तंभ पर भगवान शिव की कथाएँ कहती नक़्क़ाशी"। यहीं श्रद्धालु प्रतीक्षा करते हैं, और यहीं, महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार, गर्भगृह की ओर मुख किए "नंदी की एक प्रमुख प्रतिमा" है। इनक्रेडिबल इंडिया प्रांगण के एकमात्र जीवित स्मारक को जोड़ता है: "एक पूज्य औदुंबर वृक्ष, जिसे 300 वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है"।
गर्भगृह। गर्भगृह में "पूजित ज्योतिर्लिंग है, जो पूर्वाभिमुख है", जिसे विभाग "शिव के अनंत स्वरूप का प्रतीक" बताता है। यह छोटा कक्ष है — इनक्रेडिबल इंडिया इसे ज्योतिर्लिंगों में सबसे छोटा कहता है — और साधारण सुबहों में लिंग बस कुछ ही क़दम दूर होता है।
बारहों के मानदंड से यह मंदिर सुगठित है: न हज़ार स्तंभों का गलियारा, न तिमंज़िला मंडप, न भूमिगत उतराई। घृष्णेश्वर की सुंदरता एक अच्छी बनी वस्तु की सुंदरता है — एक सामग्री, एक रंग, एक काम।
घृष्णेश्वर दर्शन: समय, अभिषेक और गर्भगृह के नियम
समय, स्रोत के नाम सहित। इनक्रेडिबल इंडिया खुलने का समय प्रातः 5:30 और बंद होने का रात 9:30 बताता है, और आरती प्रातः 5:30, दोपहर 12:00, सायं 7:00 और रात 9:30। अनौपचारिक सूचियाँ — जिनमें से कई स्वयं को "आधिकारिक" कहती हैं — दोपहर लगभग 12 से 1 बजे का विराम, रात 9:00 का समापन, या सायं 4 बजे से दूसरा सत्र बताती हैं। महाराष्ट्र पर्यटन कोई समय प्रकाशित ही नहीं करता। हमें मंदिर ट्रस्ट की कोई वेबसाइट नहीं मिली, और जो पृष्ठ मिले उनमें से किसी पर संशोधन-तिथि नहीं है। मंदिर में पुष्टि करें; किसी तृतीय-पक्ष "ऑनलाइन बुकिंग" साइट पर तब तक भरोसा न करें जब तक मंदिर स्वयं आपको वहाँ न भेजे।
गर्भगृह का नियम। महाराष्ट्र पर्यटन "यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा" दर्ज करता है, जिसके अनुसार "पुरुष श्रद्धालु विनय और आदर के प्रतीक रूप में खुले बदन गर्भगृह में प्रवेश करते हैं"। इनक्रेडिबल इंडिया इसे अनुरोध के रूप में कहता है: "पुरुषों से प्रवेश से पहले कमीज़ उतारने का अनुरोध किया जाता है।" दो बातें साफ़ कह देनी चाहिए। पहली, यह एक वास्तविक और पुरानी परंपरा है, जिसे राज्य और केंद्र दोनों की पर्यटन संस्थाएँ बताती हैं, और यह गर्भगृह पर लागू है, प्रांगण या सभामंडप पर नहीं। दूसरी, ऐसे नियम मंदिर प्रशासन तय करता है और बदल भी सकता है; भीड़ वाले पर्व-दिनों में गर्भगृह में व्यक्तिगत प्रवेश पूरी तरह बंद भी हो सकता है। कर्मचारियों के निर्देश मानें, और एक छोटा तौलिया या शॉल साथ रखें। बेल्ट और चमड़े की वस्तुएँ भी प्रायः बाहर छोड़ी जाती हैं, ऐसा बताया जाता है।
महिलाएँ। हमने जो आधिकारिक स्रोत देखे, उनमें से कोई मंदिर या गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं लगाता, और हम भी ऐसा कोई दावा नहीं करते। गौण विवरण कहते हैं कि महिलाएँ शालीन पारंपरिक वस्त्रों में गर्भगृह में दर्शन के लिए जाती हैं। सदा की तरह, उस दिन की व्यवस्था मंदिर की होती है।
लिंग का स्पर्श। इनक्रेडिबल इंडिया दर्ज करता है कि "श्रद्धालुओं को अपने हाथों से शिवलिंग का प्रत्यक्ष स्पर्श करने की अनुमति है — एक दुर्लभ सौभाग्य"। बारहों में यह सचमुच दुर्लभ है, जहाँ अधिकतर गर्भगृहों में लिंग रेलिंग के पीछे रहता है। भीड़ के दिनों में इसे नियंत्रित या स्थगित होने की अपेक्षा रखें।
अभिषेक और पूजा। महाराष्ट्र पर्यटन यहाँ की जाने वाली विधियाँ गिनाता है: पंचामृत पूजन, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप। व्यवस्था और शुल्क मंदिर के अपने काउंटर पर तय होते हैं; कोई आधिकारिक पृष्ठ शुल्क-सूची नहीं देता, और कोई आधिकारिक पृष्ठ ऑनलाइन बुकिंग नहीं देता। शीघ्र दर्शन का वादा करने वाले किसी अजनबी को पहले से कोई राशि न दें।
मोबाइल, कैमरा, जूते। भीतर फ़ोटोग्राफ़ी और मोबाइल पर रोक व्यापक रूप से बताई जाती है, बाहर लॉकर सहित; कोई आधिकारिक पृष्ठ यह नहीं कहता, पर इसे मानकर चलें। जूते प्रवेश पर छोड़े जाते हैं, और गर्मियों में पत्थर का प्रांगण दोपहर से पहले ही तप जाता है।
वेरूळ में महाशिवरात्रि और श्रावण
महाशिवरात्रि मंदिर की सबसे बड़ी रात है। महाराष्ट्र पर्यटन रात भर के जागरण, जप और विशेष पूजाओं का वर्णन करता है; मंदिर "जीवंत सज्जा से सुसज्जित" होता है और श्रद्धालु "देश भर से" आते हैं। यह फाल्गुन (या महाराष्ट्र की अमांत गणना में माघ) के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात पड़ती है — विभाग के शब्दों में "प्रायः फ़रवरी या मार्च में"। अधिकतर पंचांग अगली महाशिवरात्रि शनिवार, 6 मार्च 2027 को रखते हैं; बुकिंग से पहले अपने पंचांग से मिला लें। बहुत लंबी पंक्तियों, नियंत्रित गर्भगृह और हर वर्ष बदलती व्यवस्थाओं की अपेक्षा रखें।
श्रावण दूसरा बड़ा अवसर है। महाराष्ट्र अमांत पंचांग मानता है, इसलिए यहाँ का श्रावण उत्तर भारत के पूर्णिमांत श्रावण से लगभग दो सप्ताह बाद आरंभ होता है और मोटे तौर पर जुलाई के अंत या अगस्त से अगस्त या सितंबर तक चलता है; श्रावण के सोमवार शिवरात्रि के बाद वर्ष की सबसे बड़ी भीड़ लाते हैं। अनौपचारिक सूचियाँ श्रावण में बहुत विस्तारित समय बताती हैं — बहुत सुबह खुलना और देर रात बंद होना — जिसकी पुष्टि का हमारे पास कोई साधन नहीं। पास ही, इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार, खुलताबाद का भद्रा मारुति मंदिर श्रावण के शनिवारों को भर जाता है, इसलिए पूरे महीने वेरूळ–खुलताबाद की सड़क व्यस्त रहती है।
दो ईमानदार बातें। मंदिर की कोई पर्व-सूची हमें नहीं मिली, इसलिए हम कोई नहीं छापते। और हमारी यह शृंखला 2026 के श्रावण और भाद्रपद में प्रकाशित हुई; यदि आप इसे प्रकाशन के दिन पढ़ रहे हैं, तो वेरूळ का अगला श्रावण 2027 की वर्षा ऋतु में है।
छत्रपति संभाजीनगर से घृष्णेश्वर कैसे पहुँचें
पहले नाम, क्योंकि वे बदले हैं। औरंगाबाद शहर का नाम 2023 में आधिकारिक रूप से छत्रपति संभाजीनगर हुआ, और ज़िले का भी। रेलवे स्टेशन का नाम 25 अक्टूबर 2025 को बदला, जब औरंगाबाद (AWB) दक्षिण मध्य रेलवे के नांदेड़ मंडल में छत्रपति संभाजीनगर (CPSN) बना। चिकलठाणा का हवाई अड्डा, जो लंबे समय तक अभिलेखों में औरंगाबाद हवाई अड्डा रहा, दिसंबर 2025 में नागर विमानन मंत्रालय से छत्रपति संभाजीनगर हवाई अड्डा कहलाने की अनुमति पा गया, और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण का अपना पृष्ठ अब यही नाम दिखाता है — यद्यपि नाम-परिवर्तन कुछ समय के लिए रुका भी था और कुछ बुकिंग प्रणालियाँ अभी पुराना नाम दिखाती हैं। IATA कोड IXU नहीं बदला है। इनक्रेडिबल इंडिया और महाराष्ट्र पर्यटन सहित सरकारी पर्यटन पृष्ठ अभी भी "Aurangabad Railway Station (AWB)" छापते हैं; इससे भ्रमित न हों।
वायुमार्ग। IXU के लिए उड़ान लें। हवाई अड्डा शहर के केंद्र से लगभग 5.5 किमी पूर्व में है; वहाँ से ज़िला प्रशासन मंदिर को लगभग 36 किमी और महाराष्ट्र पर्यटन का मंदिर-पृष्ठ लगभग 40 किमी बताता है — उसका एलोरा-पृष्ठ 36 कहता है। हवाई अड्डे पर टैक्सियाँ मिलती हैं; किराया पहले तय करें या वापसी सहित बुक करें, क्योंकि वेरूळ में अपनी टैक्सियाँ कम हैं।
रेलमार्ग। मनमाड–सिकंदराबाद लाइन पर छत्रपति संभाजीनगर (CPSN) की गाड़ियाँ शहर को मुंबई, पुणे, हैदराबाद, नागपुर और आगे से जोड़ती हैं। ज़िला प्रशासन और महाराष्ट्र पर्यटन दोनों के अनुसार स्टेशन वेरूळ से लगभग 29 किमी है। हम कोई ट्रेन संख्या या समय नहीं छापते — IRCTC या राष्ट्रीय ट्रेन पूछताछ प्रणाली (139) पर देखें, और यदि पुराने नाम से कुछ न मिले तो नए नाम से खोजें।
सड़क मार्ग। वेरूळ उस सड़क पर है जिसे ASI औरंगाबाद–चालीसगाँव मार्ग कहता है, शहर से 30–31 किमी उत्तर-उत्तर-पश्चिम। महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बसें शहर के बस स्टैंडों से एलोरा तक चलती हैं, और ज़िले के शब्दों में मंदिर तक "राज्य परिवहन बस या निजी टैक्सी से" जाया जा सकता है। गुफाओं की पार्किंग और मंदिर के बीच का अंतिम किलोमीटर ऑटो या साझा वाहन से तय होता है, या पैदल। ज़िला शहर को मुंबई से लगभग 300 किमी पूर्व-उत्तर-पूर्व बताता है; पुणे और शिर्डी दूसरे सामान्य प्रस्थान-बिंदु हैं, और बहुत-से यात्री शिर्डी, त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर को एक ही परिक्रमा में जोड़ते हैं — जिन दूरियों का स्रोत हमारे पास नहीं, वे हम नहीं छापते।
एलोरा की गुफाएँ और कैलास मंदिर: पड़ोसी हैं, एक स्थल नहीं
क्योंकि दोनों स्थल एक ही गाँव और एक ही पार्किंग साझा करते हैं, पहली बार आए यात्री प्रायः इन्हें एक मान लेते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए। घृष्णेश्वर मंदिर एक जीवित हिंदू देवालय है, जहाँ प्रतिदिन पूजा होती है; मराठा और होलकर संरक्षकों ने इसे तराशे लाल पत्थर से फिर बनाया; एक मंदिर ट्रस्ट इसे चलाता है; यह प्रतिदिन खुला रहता है और प्रवेश निःशुल्क है। कैलास मंदिर एलोरा की गुफाओं की गुफा संख्या 16 है: आठवीं शताब्दी में जीवित चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर बनाया गया स्मारक, जिसका प्रबंधन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है, जिसका टिकट लगता है, और जो हर मंगलवार बंद रहता है। वहाँ पूजा नहीं होती। एक का टिकट दूसरे से कोई संबंध नहीं रखता, और गर्भगृह के खुले बदन वाले नियम का गुफाओं से कोई लेना-देना नहीं।
फिर भी घृष्णेश्वर आने वाले किसी यात्री को एलोरा छोड़ना नहीं चाहिए, और आधिकारिक स्रोत उसके बारे में यह कहते हैं। यूनेस्को 2 किमी से अधिक में फैले 34 विहार और मंदिर बताता है, जो एक ऊँची बेसाल्ट चट्टान की दीवार में खोदे गए, और जिनमें "ईसवी 600 से 1000 तक के स्मारकों की अविच्छिन्न शृंखला" है, जो "प्राचीन भारत की विशेषता रही सहिष्णुता की भावना" को दर्शाती है। उसका संक्षिप्त विवरण इन्हें तीन समूहों में बाँटता है: बौद्ध गुफाएँ 1–12, पाँचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच खोदी गईं; ब्राह्मण गुफाएँ 13–29, जिनमें कैलास है, सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच; और जैन गुफाएँ 30–34, नवीं से बारहवीं के बीच। ASI जोड़ता है कि इस पहाड़ी शृंखला में लगभग सौ गुफाएँ हैं, जिनमें से ये 34 देखी जाती हैं।
गुफा 16, कैलास, का श्रेय ASI राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम (लगभग 757–783 ई.) को देता है और इसे "विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म उत्खनन" कहता है। यूनेस्को इसे "सबसे बड़ा एकाश्म मंदिर" और "भारत में शैल-वास्तु की पराकाष्ठा" कहता है, और कैलास पर्वत को उठाने का प्रयास करते रावण की मूर्ति तथा सामने के मंडप की छतों पर बचे चित्रों को विशेष रूप से रेखांकित करता है। इसके प्रांगण में खड़े होकर याद रखिए कि आपके सिर के ऊपर जो कुछ है, वह कभी ठोस पहाड़ था: शिल्पियों ने ऊपर से आरंभ किया और नीचे काटते गए, उस मंदिर के चारों ओर की चट्टान हटाते हुए जिसे वे अपने मन में पहले से देख रहे थे। आधिकारिक विवरण जिन अन्य गुफाओं का नाम लेता है, वे हैं गुफा 10, विश्वकर्मा (बढ़ई की गुफा), गुफा 12, तीन ताल (तिमंज़िला विहार), गुफा 15, दशावतार, गुफा 21, रामेश्वर और गुफा 29, दुमार लेणा।
व्यावहारिक बातें, ASI के अनुसार: सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला, मंगलवार बंद; प्रवेश भारतीय, SAARC और BIMSTEC यात्रियों के लिए ₹40 (ऑनलाइन ₹35) और अन्य के लिए ₹600 (ऑनलाइन ₹550); 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क। महाराष्ट्र पर्यटन चेताता है कि मानसून में गुफाओं में फिसलन हो सकती है और गर्मियों में तापमान 35°C से ऊपर जाता है, और सुबह जल्दी पहुँचने की सलाह देता है। घृष्णेश्वर के दर्शन सुबह-सुबह और गुफाएँ उसके बाद रखें — और मंगलवार हो, तो गुफाएँ किसी और दिन।
वेरूळ के निकट पावन और उल्लेखनीय स्थल
भद्रा मारुति मंदिर, खुलताबाद — इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार एलोरा की गुफाओं से लगभग 4 किमी, शहर की ओर लौटती सड़क पर खुलताबाद के छोटे क़स्बे में। यहाँ हनुमान जी शयन-मुद्रा — भाव-समाधि — में हैं, जो भारत में बहुत कम स्थानों पर मिलती है; परंपरा इसे स्वयंभू और समर्थ रामदास द्वारा खोजी गई मानती है। इनक्रेडिबल इंडिया समय प्रातः 6:00 से रात 8:00 देता है और श्रावण के शनिवारों की भीड़ का उल्लेख करता है। खुलताबाद वही क़स्बा है जहाँ, ऐतिहासिक अभिलेख के अनुसार, मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को 1707 में जान-बूझकर सादी क़ब्र में दफ़नाया गया; यहाँ कई सूफ़ी दरगाहें भी हैं, और पृष्ठ के अनुसार क़स्बे का पुराना नाम भद्रावती था।
दौलताबाद / देवगिरि किला — शहर से लगभग 16 किमी, एलोरा के रास्ते पर, लगभग 200 मीटर ऊँची शंकु-सी पहाड़ी पर। महाराष्ट्र पर्यटन अपने पृष्ठ को "देवगिरि / दौलताबाद" शीर्षक देता है और मूल बातें दर्ज करता है: बारहवीं शताब्दी में यादव वंश के भिल्लम पंचम द्वारा निर्मित, यादवों की राजधानी, और फिर 1327 में मुहम्मद बिन तुग़लक़ के दिल्ली से राजधानी हटाने के विफल प्रयोग का गंतव्य। इसकी चाँद मीनार को विभाग एक पृष्ठ पर 30 मीटर और दूसरे पर 64 मीटर बताता है — जो भी उद्धृत करें, स्रोत सहित करें। राज्य के पर्यटन मंत्री ने 2022 में देवगिरि नाम बहाल करने का प्रस्ताव घोषित किया था; किला ASI स्मारक है और दोनों नामों से चिह्नित है। यही वह पहाड़ है जिसे शिव पुराण के अनुवादक कथा के देवगिरि से जोड़ते हैं।
बीबी का मकबरा — ज़िला प्रशासन के अनुसार शहर के केंद्र से लगभग 3 किमी, सफ़ेद संगमरमर और पलस्तर का "दक्खन का ताज", जो 1650–1670 के दशकों में औरंगज़ेब की पत्नी दिलरस बानो बेगम, राबिया-उद-दौरानी, की स्मृति में बना। इसे किसने बनवाया, इस पर एक ही विभाग अपने ही विरुद्ध खड़ा है — महाराष्ट्र पर्यटन का एलोरा-पृष्ठ औरंगज़ेब कहता है, उसका देवगिरि-पृष्ठ उसके पुत्र आज़म शाह को अपनी माँ की स्मृति में — और इनक्रेडिबल इंडिया 1679 में औरंगज़ेब कहता है। इनक्रेडिबल इंडिया समय प्रातः 8:00 से रात 8:00 देता है।
औरंगाबाद की गुफाएँ — बीबी के मकबरे के पीछे की पहाड़ियों में काटी बौद्ध गुफाएँ, महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार "6वीं और 8वीं शताब्दी के बीच" की, और एलोरा से बहुत शांत।
पानचक्की — शहर में सत्रहवीं शताब्दी की जल-चक्की, जो दूर से लाई जल-नहर से चलती है; महाराष्ट्र पर्यटन और इनक्रेडिबल इंडिया दोनों इसे सूचीबद्ध करते हैं।
अजंता की गुफाएँ — इनक्रेडिबल इंडिया इन्हें शहर से लगभग 100 किमी बताता है; यह एक अलग दिन का कार्यक्रम है, और ध्यान रखें कि यह मंगलवार नहीं, सोमवार को बंद रहती हैं। एलोरा के साथ ये इस क्षेत्र के दो विश्व धरोहर स्थल हैं।
त्र्यंबकेश्वर और भीमाशंकर — महाराष्ट्र के दो अन्य निर्विवाद ज्योतिर्लिंग, जहाँ हमारी शृंखला पहले जा चुकी है: नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर और सह्याद्रि के वन में भीमाशंकर। बहुत-से यात्री तीनों को एक ही यात्रा में पूरा करते हैं।
घृष्णेश्वर यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय
- अक्टूबर से मार्च — मंदिर और एलोरा दोनों के लिए महाराष्ट्र पर्यटन की सलाह, "शीतल और सुहावना", जिसमें दिन का तापमान वह 15°C से 30°C बताता है। इनक्रेडिबल इंडिया का गंतव्य पृष्ठ इसे नवंबर से मार्च तक सीमित करता है। अवधि को स्रोत सहित कहें; दोनों वर्तमान हैं।
- फ़रवरी से मार्च के आरंभ तक — इसी अवधि में महाशिवरात्रि का समय: सबसे बड़ी भक्ति, और सबसे बड़ी भीड़। शहर में ठहरने की व्यवस्था बहुत पहले कर लें।
- जून से सितंबर (मानसून और श्रावण) — महाराष्ट्र पर्यटन परिदृश्य को "हरा-भरा" कहता है और गुफाओं में फिसलन की संभावना बताता है। श्रावण के सोमवार और खुलताबाद के श्रावण-शनिवार सड़क भर देते हैं। वर्षा से बचाव साथ रखें और पंक्तियों की अपेक्षा रखें।
- अप्रैल से जून — तापमान "35°C से ऊपर जा सकता है", विभाग चेताता है, और लाल पत्थर का प्रांगण तथा गुफाओं के रास्ते दोनों गर्मी पकड़े रहते हैं। दर्शन भोर में; गुफाएँ सुबह जल्दी, या फिर नहीं।
सुरक्षा और आधिकारिक मार्गदर्शन
- यात्रा से पहले पुष्टि करें। इस मंदिर के समय, नियम या शुल्क का कोई संशोधन-तिथि वाला आधिकारिक विवरण प्रकाशित नहीं है, और हमें मंदिर ट्रस्ट की कोई वेबसाइट नहीं मिली। समय, गर्भगृह की व्यवस्था और अभिषेक की प्रक्रिया स्वयं मंदिर में पुष्टि करें, और तृतीय-पक्ष साइटों को — स्वयं को आधिकारिक कहने वालों को भी — असत्यापित मानें।
- गर्भगृह की परंपराओं का सम्मान करें। पुरुष गर्भगृह में प्रवेश से पहले ऊपरी वस्त्र उतारने की अपेक्षा रखें, और सभी शालीन वस्त्र पहनें; उस दिन मंदिर कर्मचारियों की बात मानें, क्योंकि नियम बदल सकते हैं और भीड़-व्यवस्था सामान्य प्रथा पर भारी पड़ती है।
- शिवालय तीर्थ और किसी भी जल में वहीं उतरें जहाँ स्थानीय श्रद्धालु उतर रहे हों और मंदिर अनुमति दे; कोई आधिकारिक पृष्ठ गहराई, सीढ़ियों या निगरानी का वर्णन नहीं करता।
- एलोरा में मंगलवार की छुट्टी, सूर्योदय-से-सूर्यास्त का समय और ASI का टिकट याद रखें; रास्ते असमान हैं और वर्षा में फिसलन भरे, और गुफाओं के भीतर रोशनी नहीं है।
- गर्मी और पत्थर। जूते मंदिर के बाहर रहते हैं; गर्मियों में दोपहर से पहले ही फ़र्श जलने लगता है। जल साथ रखें, सिर ढकें, और बच्चों-बुज़ुर्गों को सभामंडप की छाया में रखें।
- भीड़ और धन। महाशिवरात्रि और श्रावण के सोमवारों को बहुत लंबी पंक्तियों और बंद या नियंत्रित गर्भगृह-प्रवेश की अपेक्षा रखें। आधिकारिक पंक्ति में रहें, क़ीमती सामान कम रखें, और "विशेष" दर्शन के लिए किसी को पहले से कुछ न दें।
- टिकट पर नाम। रेल बुकिंग छत्रपति संभाजीनगर (CPSN) से और उड़ानें IXU से खोजें — साइट हवाई अड्डे का जो भी नाम दिखाए।
घृष्णेश्वर आज हमें क्या सिखाता है
हर तीर्थ एक शिक्षा देता है, और बारहवाँ वह शिक्षा देता है जिसे जीना सबसे कठिन है।
घुश्मा की पूजा इस कथा का चमत्कार नहीं है। उसकी पूजा साधारण है — मिट्टी, जल, एक सौ एक छोटे लिंग, हर सुबह उसी सरोवर तक वही रास्ता। चमत्कार यह है कि उसने यह अगली सुबह भी किया। हममें से अधिकतर तब प्रार्थना कर सकते हैं जब जीवन दयालु हो; कथा पूछती है कि जब साधना के सिवा कुछ न बचे, तब साधना का क्या होता है। उसका उत्तर — जिसने दिया है, वही रक्षा करेगा — हार मानना नहीं है। यह इस बात को अस्वीकार करना है कि शोक तय करे कि उसके हाथ क्या करेंगे। सनातन धर्म में ऐसी साधना के लिए एक शब्द है: नित्य — दैनिक, बिना शर्त। पुराण का वचन यह नहीं है कि ऐसी साधना हर क्षति को मिटा देती है। वचन यह है कि शिव देखते हैं।
फिर त्रिशूल। ईश्वर घुश्मा को ठीक वही देने आते हैं जो उसकी जगह हम सब चाहते, और वह मना कर देती है। सुदेहा कोई सहानुभूति का पात्र नहीं है; पाठ उसे नरम नहीं करता। क्षमा फिर भी मिलती है, और उसे देने वाली पीड़िता स्वयं है, कोई दर्शक नहीं — और कारण घुश्मा साफ़ कहती है: वह ऐसी मनुष्य होना चाहती है जिसकी उपस्थिति पाप को गला दे, न कि ऐसी जिसकी शिकायत का हिसाब चुक जाए। ज्योतिर्लिंग उसके लिंगों का नहीं, उसकी क्षमा का पुरस्कार है। बारह में से अंतिम का नाम उस स्त्री पर है जिसने क्षमा किया। लाल पत्थर के प्रांगण में बैठकर इस पर ठहरना चाहिए।
और मंदिर स्वयं एक धीमी शिक्षा देता है, जो इस पूरी शृंखला में बार-बार मिली। घृष्णेश्वर टूटा, एक मराठा दादा ने उसे फिर बनाया, एक होलकर रानी ने उसका जीर्णोद्धार किया — उस गाँव में, जिसकी चट्टान में तीन धर्मों के देवालय अगल-बग़ल खड़े हैं। ज्योतिर्लिंग, यह हमने बारह बार सीखा, कोई भवन नहीं है। यह वह स्थान है जहाँ लोग बार-बार लौटते हैं और उसे फिर-फिर बनाते हैं, क्योंकि वहाँ कुछ ऐसा मिला था जो सच था।
बारह सोमवार, बारह ज्योतिर्लिंग: यात्रा पूर्ण
बारह सोमवार पहले हम सोमनाथ के तट पर खड़े थे, जहाँ चंद्र को उसका प्रकाश वापस मिला कहा जाता है, और हमने कहा था कि ज्योतिर्लिंग प्रकाश का वह स्तंभ है जिसे आँख नहीं देख सकती, पर तीर्थयात्री जिस तक चलकर जा सकता है। हम बारह तक चले। अरब सागर से रामेश्वरम के समुद्र-छोर तक, केदारनाथ की बर्फ से भीमाशंकर के सह्याद्रि वन तक; काशी की गलियों और उज्जैन के घाटों से नर्मदा के द्वीप तक; श्रीशैलम की पहाड़ियों से देवघर के प्रांगण और द्वारका के भूमिगत कक्ष तक, और अब दक्खन के उस गाँव तक, जहाँ गुफाएँ और मंदिर एक ही पार्किंग साझा करते हैं। महाराष्ट्र के तीन, गुजरात के दो, मध्य प्रदेश के दो, और आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड तथा तमिलनाडु का एक-एक। बारह अलग पत्थर, एक शिव।
कुछ प्रतिमान उभरे, जो कोई एक लेख नहीं दिखा सकता था। बारह में से लगभग हर एक टूटा और फिर बना, और उनमें से कई एक ही दो हाथों से — अहिल्याबाई होलकर और मराठों के — एक ही आधी शताब्दी में। लगभग हर एक की कथा में किसी राजा की शक्ति नहीं, बल्कि किसी भक्त की बिना शर्त साधना ईश्वर को ठहरने के लिए लाती है। कई के एक से अधिक दावेदार स्थान हैं, और हर बार हमने पाया कि परंपरा उस मतभेद से बची रही। और बारह में से हर एक के बारे में इंटरनेट जितना दावा करता है, उससे कम प्रमाणित तथ्य वह स्वयं प्रकाशित करता है — इसीलिए इस शृंखला ने इतनी बार कहा कि मंदिर में पूछिए — और अब अंतिम बार फिर कहती है।
इसे लिखने का हम कोई पुण्य नहीं जताते, और इसे पढ़ने का आप भी न जताएँ। बारह लेख कोई यात्रा नहीं हैं, और यात्रा भी किसी बात की गारंटी नहीं है — न रोग-मुक्ति की, न समृद्धि की, न क्षमा की, न मोक्ष की। वे परंपरा के वचनों और शिव के अधिकार में हैं, हमारे नहीं। जो हम ईमानदारी से कह सकते हैं, वह छोटा है और, हमारे विचार से, पर्याप्त: ये बारह स्थान हैं, इन्हें बहुत लंबे समय से प्रेम किया गया है, और जो व्यक्ति घुश्मा जैसी एकाग्रता लेकर — जो उसने अपनी मिट्टी को दी थी — इन तक जाएगा, वह वैसा ही लौटकर नहीं आएगा।
वेरूळ जाएँ तो सुबह जल्दी जाएँ। लाल शिखर के सामने शीश नवाएँ, फिर एक किलोमीटर चलकर चट्टान तक जाएँ और कैलास के प्रांगण में खड़े हों, और दोनों को एक ही बात दो भाषाओं में कहने दें। फिर घर लौटें, और अगली सुबह अपने हाथों से कुछ छोटा-सा बनाएँ — सुबह जो भी लेकर आए।
ॐ नमः शिवाय।
स्रोत और आधिकारिक संदर्भ
- महाराष्ट्र पर्यटन, महाराष्ट्र सरकार — घृष्णेश्वर मंदिर
- महाराष्ट्र पर्यटन — एलोरा की गुफाएँ
- महाराष्ट्र पर्यटन — देवगिरि / दौलताबाद किला
- इनक्रेडिबल इंडिया, पर्यटन मंत्रालय — घृष्णेश्वर मंदिर
- इनक्रेडिबल इंडिया — एलोरा की गुफाएँ
- इनक्रेडिबल इंडिया — छत्रपति संभाजीनगर गंतव्य
- इनक्रेडिबल इंडिया — भद्रा मारुति मंदिर, खुलताबाद
- इनक्रेडिबल इंडिया — बीबी का मकबरा
- ज़िला छत्रपति संभाजीनगर — एलोरा लेणी और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, वेरूळ
- ज़िला छत्रपति संभाजीनगर — दर्शनीय स्थल
- यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र — एलोरा की गुफाएँ
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण — विश्व धरोहर स्थल: एलोरा की गुफाएँ
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण — छत्रपति संभाजीनगर हवाई अड्डा
- शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 32 — सुदेहा और सुधर्मा की कथा (विज़डम लाइब्रेरी, जे. एल. शास्त्री अनुवाद)
- शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 33 — ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर की उत्पत्ति और महिमा
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ है, और एलोरा तथा शहर से कितनी दूर है?
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर ज़िले (पूर्व नाम औरंगाबाद) की खुलताबाद तहसील के वेरूळ गाँव में है। ज़िला प्रशासन और महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार यह शहर से सड़क मार्ग से लगभग 30–31 किमी उत्तर-पश्चिम में है, और एलोरा की गुफाओं के प्रवेश से लगभग 1–1.5 किमी — ज़िला पृष्ठ इसे गुफाओं से एक किलोमीटर की पैदल दूरी बताता है। मंदिर और गुफाएँ दो अलग स्थल हैं, जिनका प्रबंधन भी अलग-अलग है।
क्या घृष्णेश्वर सचमुच बारहवाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग है?
सबसे प्रचलित क्रम में, हाँ। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र की अंतिम पंक्ति है — हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये — जो घुश्मेश को बारहवें और अंतिम स्थान पर रखती है। महाराष्ट्र पर्यटन और इनक्रेडिबल इंडिया दोनों इसे 12वाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग कहते हैं, और शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता भी इसकी कथा सबसे अंत में कहती है। हमारी शृंखला भी इसी क्रम पर चली है, इसीलिए यह लेख #12 है और '12 सोमवार, 12 ज्योतिर्लिंग' यात्रा का समापन।
घृष्णेश्वर, घुश्मेश्वर या ग्रिश्नेश्वर — सही नाम कौन-सा है?
तीनों प्रचलित हैं और कोई ग़लत नहीं। शिव पुराण इस ज्योतिर्लिंग को भक्त घुश्मा के नाम से घुश्मेश या घुश्मेश्वर कहता है। महाराष्ट्र पर्यटन अपने पृष्ठ के शीर्षक में Ghrishneshwar और पाठ में Grishneshwar लिखता है; इनक्रेडिबल इंडिया Grishneshwar; ज़िला प्रशासन Ghrishneshwar और Grushneshwar। हिंदी और मराठी में सबसे प्रचलित रूप घृष्णेश्वर है, और जहाँ पुराण का अनुसरण होता है वहाँ घुश्मेश्वर। यह लेख मंदिर के लिए घृष्णेश्वर और पुराण के उद्धरणों में घुश्मेश का प्रयोग करता है।
घृष्णेश्वर की घुश्मा की कथा क्या है?
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय 32–33) इसे पावन परंपरा के रूप में कहती है। देवगिरि के निकट ब्राह्मण सुधर्मा अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे, जो निःसंतान थी। उसके आग्रह पर सुधर्मा ने उसकी छोटी बहन घुश्मा से विवाह किया, जो प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजती और पास के सरोवर में विसर्जित करती थी। उसे पुत्र हुआ; सुदेहा की ईर्ष्या बढ़ती गई और उसने युवक की हत्या कर शव सरोवर में डाल दिया। घुश्मा ने अपनी पूजा नहीं छोड़ी, पुत्र को सरोवर के तट पर जीवित पाया, और शिव प्रकट हुए तो उनसे अपनी बहन को क्षमा करने की प्रार्थना की। शिव वहाँ घुश्मेश रूप में स्थित हो गए।
घृष्णेश्वर मंदिर में दर्शन का समय और नियम क्या हैं?
पर्यटन मंत्रालय की साइट इनक्रेडिबल इंडिया मंदिर खुलने का समय प्रातः 5:30 और बंद होने का समय रात 9:30 बताती है, और आरती प्रातः 5:30, दोपहर 12, सायं 7 और रात 9:30 बजे; अनौपचारिक सूचियाँ दोपहर के विराम और बंद होने के समय पर भिन्न हैं, और हमें मंदिर ट्रस्ट की कोई वेबसाइट नहीं मिली जो इसे तय करे। महाराष्ट्र पर्यटन इस परंपरा को दर्ज करता है कि पुरुष श्रद्धालु गर्भगृह में ऊपरी वस्त्र उतारकर प्रवेश करते हैं। हमने जो आधिकारिक स्रोत देखे, उनमें से कोई महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं लगाता। भीतर मोबाइल और कैमरे की मनाही व्यापक रूप से बताई जाती है। यह सब यात्रा के दिन मंदिर में पुष्टि करें।
क्या गर्भगृह में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमीज़ उतारनी पड़ती है?
यही प्रचलित परंपरा बताई जाती है। महाराष्ट्र पर्यटन लिखता है कि यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा के अनुसार पुरुष श्रद्धालु विनय और आदर के प्रतीक रूप में खुले बदन गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, और इनक्रेडिबल इंडिया कहता है कि पुरुषों से प्रवेश से पहले कमीज़ उतारने का अनुरोध किया जाता है। ऐसे नियम मंदिर प्रशासन बनाता और बदलता है, पर्यटन वेबसाइटें नहीं; इसलिए इसे संभावित व्यवस्था मानें, मंदिर कर्मचारियों के निर्देश मानें, और साथ में एक शॉल या तौलिया रखें।
क्या घृष्णेश्वर मंदिर और एलोरा का कैलास मंदिर एक ही स्थान हैं?
नहीं। घृष्णेश्वर एक जीवित शिव मंदिर है, जहाँ प्रतिदिन पूजा होती है; इसे 16वीं–18वीं शताब्दी में लाल पत्थर से पुनर्निर्मित किया गया और एक मंदिर ट्रस्ट इसे चलाता है। कैलास मंदिर एलोरा की गुफाओं की गुफा संख्या 16 है — एक ही चट्टान से काटा गया स्मारक, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम (लगभग 757–783 ई.) से जोड़ता है; इसका प्रबंधन ASI करता है, इसका टिकट लगता है और यह मंगलवार को बंद रहता है। दोनों लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हैं और प्रायः एक ही दिन देखे जाते हैं, पर एक का टिकट दूसरे से संबंधित नहीं है।
घृष्णेश्वर हवाई, रेल और सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें?
हवाई अड्डा छत्रपति संभाजीनगर के चिकलठाणा में है (IATA कोड IXU); ज़िला प्रशासन इसे मंदिर से लगभग 36 किमी और महाराष्ट्र पर्यटन लगभग 40 किमी बताता है। यह लंबे समय तक औरंगाबाद हवाई अड्डा कहलाया, और नागर विमानन मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में इसे छत्रपति संभाजीनगर हवाई अड्डा नाम देने की अनुमति दी, इसलिए बुकिंग साइटों पर दोनों नाम दिख सकते हैं। रेलवे स्टेशन का नाम 25 अक्टूबर 2025 को छत्रपति संभाजीनगर (नया कोड CPSN, पुराना AWB) हो गया और यह लगभग 29 किमी दूर है। शहर से एलोरा और वेरूळ के लिए राज्य परिवहन की बसें और टैक्सियाँ चलती हैं।
यात्रा का सर्वोत्तम समय कौन-सा है, और महाशिवरात्रि तथा श्रावण में क्या होता है?
महाराष्ट्र पर्यटन अक्टूबर से मार्च की सलाह देता है; इनक्रेडिबल इंडिया का गंतव्य पृष्ठ नवंबर से मार्च कहता है। मानसून में हरियाली होती है पर एलोरा की गुफाओं में फिसलन, और गर्मियों की दोपहर 35°C से ऊपर जाती है। महाशिवरात्रि, प्रायः फ़रवरी या मार्च में, रात भर के जागरण और वर्ष की सबसे बड़ी भीड़ लाती है — अधिकतर पंचांग अगली महाशिवरात्रि शनिवार, 6 मार्च 2027 को रखते हैं; अपने पंचांग से पुष्टि करें। महाराष्ट्र में अमांत गणना से श्रावण के सोमवार दूसरा बड़ा अवसर हैं। पर्व की व्यवस्थाएँ और विस्तारित समय हर वर्ष बदलते हैं; यात्रा से पहले मंदिर से पूछें।



