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माँ कूष्मांडा: ब्रह्मांड की सृजनकर्त्री — नवरात्रि का चौथा स्वरूप (2026)

नवदुर्गा में चतुर्थ माँ कूष्मांडा की पूजा चतुर्थी तिथि — 14 अक्टूबर 2026 — को होती है। मुस्कान से ब्रह्मांड रचने वाली देवी की कथा, अष्टभुजा स्वरूप, पूजा विधि, मंत्र और भोग।

अंशुल पात्रो
सिंहिनी पर आरूढ़ अष्टभुजा माँ कूष्मांडा का भक्तिचित्र — सूर्य-सा तेजोमय प्रभामंडल, हाथों में अमृत-कलश, माला, गदा, चक्र आदि।

वह मुस्कान जिसने ब्रह्मांड रच दिया

नवरात्रि का चौथा दिन पर्व का सबसे विराट दावा करता है। जब सृष्टि नहीं थी — न सूर्य, न लोक, न स्वयं प्रकाश — तब, परंपरा कहती है, आदिशक्ति मुस्कुराईं। और उस मंद हास (ईषत् हास्य) की कौंध में ब्रह्मांड — सृष्टि का अंड, समूचा विश्व — अस्तित्व में आ गया। जिस स्वरूप की मुस्कान से यह हुआ, वे हैं माँ कूष्मांडा — नवदुर्गा में चतुर्थ, जिनकी पूजा 2026 में चतुर्थी — बुधवार, 14 अक्टूबर को है।

पहले तीन स्वरूपों की कथा मानवीय थी: एक पुत्री, एक तपस्विनी, एक वधू। कूष्मांडा के साथ दृष्टि परम तक खुल जाती है: यही देवी वह हैं जिनमें सारी कथाएँ, उनके कहने वाले, और वह प्रकाश जिसमें वे कही जाती हैं — सब उदित होते हैं। यह ऐसा है जैसे परिवार के चित्र-संग्रह से आँख उठाकर कोई रात का आकाश देख ले।

एक दृष्टि में माँ कूष्मांडा

पारंपरिक क्रम नवदुर्गा में चतुर्थ
तिथि चतुर्थी
2026 पूजा तिथि बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 (नई दिल्ली, द्रिक पंचांग परंपरा)
वाहन सिंहिनी
स्वरूप अष्टभुजा — कमण्डल, धनुष, बाण, कमल; अमृत-कलश, जपमाला, गदा, चक्र
अधिष्ठित ग्रह सूर्य
पारंपरिक भोग मालपुआ; कूष्माण्ड (पेठा) भी
प्रिय पुष्प लाल पुष्प
दिन का रंग (लोक-परंपरा) 2026 में गहरा नीला (रॉयल ब्लू) — वार आधारित प्रथा, शास्त्रीय विधान नहीं

नौ स्वरूपों का प्रमाणित 2026 पंचांग शृंखला के मुख्य पृष्ठ पर है।

नाम का अर्थ: तीन छोटे अक्षर, एक ब्रह्मांड

पारंपरिक व्युत्पत्ति कु-ऊष्मा-अण्ड को पढ़ती है: "जिनकी तनिक (कु) ऊष्मा (ऊष्मा) से अंड (अण्ड) उत्पन्न हुआ" — वैदिक-पौराणिक सृष्टि-विद्या का ब्रह्मांड-अंड, जिससे सारे लोक खुलते हैं। व्याकरण में छिपा दावा कोमल है: सृष्टि उनके लिए श्रम नहीं थी। देवी को उसकी उतनी ही क़ीमत चुकानी पड़ी जितनी एक माँ को मुस्कान की।

शब्द का दूसरा, ठेठ धरती वाला अर्थ भी है: संस्कृत में कूष्माण्ड सफ़ेद कद्दू — पेठे वाला कुम्हड़ा — को कहते हैं। परंपरा यह सब्ज़ी उन्हें प्रिय मानती है और उनका विशिष्ट अर्पण बनाती है। दोनों अर्थ एक-दूसरे को छूते हैं: ब्रह्मांड-अंड की स्वामिनी भक्त के आँगन का कुम्हड़ा भी उसी कृपा से स्वीकारती हैं। उनके लिए न कुछ अति विराट है, न कुछ अति साधारण।

कथा: सूर्य से पहले का प्रकाश

नवदुर्गा परंपरा में — और देवी भागवत की उस दृष्टि की प्रतिध्वनि में जहाँ देवी परम सृजनकर्त्री हैं — कूष्मांडा का वृत्तांत यों चलता है:

जब सृष्टि नहीं थी — न सूर्य, न लोक, केवल दिशाहीन अंधकार — तब आदिशक्ति इस रूप में प्रकट हुईं और मुस्कान से ब्रह्मांड रच दिया। फिर, नवजात सृष्टि कहीं वापस अंधकार में न जम जाए, इसलिए उन्होंने स्वयं सूर्य के गर्भ में निवास किया — परंपरा के अनुसार वह सामर्थ्य केवल उन्हीं में है। उनके शरीर का तेज ही वह है जिसे हम धूप कहते हैं; वही सूर्य को ऊष्मा, दिशा और स्थिरता देती हैं।

प्रमाण-टिप्पणी: यह सृष्टि-विषयक कथा है, किसी एक अध्याय का उद्धरण नहीं — नवदुर्गा परंपरा का वह काव्य, जो दुर्गा सप्तशती सिद्धांत रूप में कहती है: देवी जगद्धात्री हैं, सब रूपों से — देवताओं के रूपों से भी — पूर्व। त्रिदेव और परम तत्त्व के संबंध का विस्तृत मानचित्र हमारे लेख सनातन धर्म की शाश्वत त्रिमूर्ति में है।

स्वरूप: आठ भुजाओं में समाया विश्व

माँ कूष्मांडा सिंहिनी पर आरूढ़ हैं और अष्टभुजा देवी कहलाती हैं। पारंपरिक वर्णन में उनके हाथों में हैं: दाहिनी ओर कमण्डल, धनुष, बाण और कमल; बाईं ओर अमृत-कलश, जपमाला, गदा और चक्र। परंपरा जोड़ती है कि उनकी जपमाला में समस्त सिद्धियाँ और निधियाँ देने की शक्ति निहित है।

पूरे विग्रह को एक साथ पढ़िए: रक्षा के लिए शस्त्र, पोषण के लिए अमृत, अनुग्रह के लिए माला — एक सृजनकर्त्री का संपूर्ण साधन-कोश। उनकी कांति सूर्य-सी कही गई है; अधिष्ठित ग्रह भी, स्वाभाविक ही, सूर्य।

घर पर माँ कूष्मांडा की पूजा कैसे करें

  1. कलश के समक्ष प्रातः नित्य पूजन — दीप, धूप, जल — हर दिन की भाँति।
  2. लाल पुष्प, रोली, अक्षत अर्पित करें।
  3. मालपुए का भोग लगाएँ, और उपलब्ध हो तो पेठा या कूष्माण्ड के व्यंजन — उनका नामधारी अर्पण। (कई परिवार छोटा समूचा कुम्हड़ा अर्पित कर बाद में उसे प्रसाद रूप में पकाते हैं।)
  4. कुछ क्षण प्रातः सूर्य के सम्मुख खड़े हों — भक्त परंपरागत रूप से उन्हें सूर्य के साथ स्मरण करते हैं, सूर्योदय पर अर्घ्य देते हुए।
  5. मंत्र-जप करें (नीचे) — 108 बार या जितना ध्यान टिके।
  6. परिवार सहित संध्या-आरती।

दीप, अर्पण और आरती की मूल विधि के लिए हमारा साधना खंड देखें।

मंत्र, प्रार्थना और अर्थ

मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

प्रार्थना (नवदुर्गा परंपरा के अनुसार):

सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

"जो अपने कर-कमलों में अमृत से परिपूर्ण कलश धारण करती हैं — वे कूष्मांडा मेरे लिए शुभदायिनी हों।"

भोग, पुष्प और दिन का रंग

  • भोग: मालपुआ — घी में तला कोमल पकवान — चौथे दिन का क्लासिक अर्पण, जिसे परंपरा बुद्धि की प्रखरता से जोड़ती है। पेठा (कूष्माण्ड) उनका नामधारी अर्पण है; उत्तर भारत में पेठे की मिठाई सुंदर विकल्प है।
  • पुष्प: लाल पुष्प उन्हें प्रिय हैं।
  • रंग: लोकप्रिय तालिका 14 अक्टूबर 2026 को गहरा नीला बताती है — प्रिय वार-आधारित प्रथा, शास्त्र नहीं।

चतुर्थी का चिंतन

कूष्मांडा की शिक्षा आनंद के अर्थशास्त्र की है: जो रचते हो, हल्केपन से रचो तो सर्वोत्तम रचते हो। परंपरा का आग्रह है कि विश्व चिंता से निचोड़कर नहीं निकाला गया; वह मुस्कान से रचा गया। हममें से अधिकांश अपने दिन उलटी रीति से गढ़ते हैं — तनकर, मानो परिश्रम तभी गिना जाए जब वह चुभे। चौथा दिन पूछता है: तुम्हारा काम कैसा दिखे, यदि तुम उसे वैसे गढ़ो जैसे उन्होंने विश्व गढ़ा — उदारता से, तेज से, लगभग क्रीड़ा-भाव से?

व्रत पर: पर्व के मध्य की थकान वास्तविक है। ऊर्जा घटे तो भाव छोड़ने के बजाय उपवास को ढालें — फल, दूध, धूप में जल। जो देवी सूर्य में निवास करती हैं, वे अपने भक्तों से उनका प्रकाश चुकता नहीं करवातीं।

कल ब्रह्मांड की सृजनकर्त्री बनती हैं — सब रूपों में सबसे आत्मीय — गोद में शिशु लिए एक माँ: माँ स्कंदमाता, पंचम स्वरूप। पूरी शृंखला नवरात्रि: माँ दुर्गा के नौ स्वरूप पर।

संदर्भ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि 2026 में माँ कूष्मांडा की पूजा कब है?

माँ कूष्मांडा की पूजा शारदीय नवरात्रि की चतुर्थी तिथि — बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 (नई दिल्ली, द्रिक पंचांग परंपरा) — को होती है। तिथि का समय शहर के अनुसार बदलता है, अपने नगर का पंचांग देखें।

माँ कूष्मांडा का मंत्र क्या है?

सरल मंत्र है — 'ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः'। पारंपरिक प्रार्थना है — 'सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥' — अमृत से पूर्ण कलश अपने कर-कमलों में धारण करने वाली कूष्मांडा मेरे लिए शुभदायिनी हों।

कूष्मांडा नाम का अर्थ क्या है?

पारंपरिक व्युत्पत्ति कु (थोड़ी), ऊष्मा (ऊर्जा/उष्णता) और अण्ड (अंडा) को जोड़ती है: जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान की ऊष्मा से ब्रह्मांड-रूपी अंड रच दिया। संस्कृत में कूष्माण्ड सफ़ेद कद्दू (पेठा) को भी कहते हैं, जो परंपरा में उन्हें विशेष प्रिय अर्पण है।

माँ कूष्मांडा को कौन-सा भोग लगाया जाता है?

चौथे दिन का पारंपरिक भोग मालपुआ है — इसे बुद्धि और निर्णय-क्षमता की प्रखरता से जोड़ा जाता है। कई क्षेत्रों में कूष्माण्ड (पेठा) या उससे बनी मिठाई भी अर्पित होती है। पुष्पों में लाल फूल उन्हें प्रिय हैं।

माँ कूष्मांडा का सूर्य से क्या संबंध है?

परंपरा कहती है कि सूर्य के मध्य (गर्भ) में निवास करने की शक्ति केवल उन्हीं में है — उनके शरीर की कांति ही सूर्य का प्रकाश है, और वही सूर्य को दिशा व ऊर्जा देती हैं। इसीलिए नवग्रहों में सूर्य उनके अधीन माना जाता है।

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